मोदी कभी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने की सोचें, इसकी संभावना नहीं, क्योंकि इससे उनकी शक्तियों में कटौती होगी। वर्ष 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने भी समान कारण के चलते वह प्रणाली अपनाने की अपनी योजना छोड़ दी थी …

[भानु धमीजा]

कांग्रेस पार्टी के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर तर्क दिया है कि अगर भारत सच में ऐसा लोकतंत्र चाहता है जो कारगर हो तो इसे अमरीकी-प्रकार की राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना लेनी चाहिए। उन्होंने यह मसला पहले भी कई बार उठाया है, परंतु इसका ताजा कारण है राजस्थान में खेला जा रहा भद्दा राजनीतिक खेल।

विडंबना है कि इस तर्कसंगत विचार को पीछे धकेलने का काम थरूर की अपनी पार्टी के भीतर से ही किया जा रहा है। हाल ही तक पार्टी के प्रवक्ता रहे संजय झा ने एक लेख में घोषित किया कि राजस्थान में दिक्कत इस कारण नहीं कि भारत की संसदीय प्रणाली असफल हो चुकी है, बल्कि इसलिए कि इसे सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा विकृत किया जा रहा है। राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने के सुझाव का मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मोहम्मद अयूब ने भी विरोध किया। इस आधार पर कि भारत की समस्याएं इसकी बिकाऊ राजनीतिक संस्कृति के कारण हैं, संसदीय प्रणाली की वजह से नहीं। इसी प्रकार की आपत्तियां जेएनयू छात्र संघ के एक पूर्व अध्यक्ष एन साई बालाजी ने की हैं। वह तर्क देते हैं कि भारत का ‘‘लोकतंत्र लोकतांत्रिक’’ बनाने की आवश्यकता है, न कि वर्तमान प्रणाली का परित्याग करने की।

राष्ट्रपति प्रणाली संसदीय प्रणाली से इसीलिए निश्चित रूप से बेहतर है क्योंकि इसे एक सत्तारूढ़ राजनीतिक पार्टी या एक भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति द्वारा विकृत किए जाने की बहुत कम आशंका है। थरूर के सुझाव का आधार राष्ट्रपति प्रणाली की अद्वितीय ढांचागत सुदृढ़ताएं हैं — कार्यकारी अधिकारियों का प्रत्यक्ष निर्वाचन, कार्यकारी और विधायी शाखाओं की स्वतंत्रता, और शक्तियों का पृथक्करण — जो बहुसंख्यकवाद या सरकार गिराना लगभग असंभव बनाती है।

कांग्रेस का डर इस भ्रम के कारण है कि राष्ट्रपति प्रणाली नरेंद्र मोदी के लिए तानाशाही का रास्ता खोल देगी। बहुत से कांगे्रस नेता सोचते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी बहुत लोकप्रिय हैं, वह राष्ट्रपति निर्वाचित हो जाएंगे और देश पर तानाशाही से राज करेंगे। ‘‘कांग्रेस में आम विश्वास है कि संसदीय प्रणाली तानाशाहीपूर्ण शासन से बचाती है,’’ झा ने लिखा। वह एक पार्टी नेता के कथन का हवाला देते हुए थरूर के विचार को ‘‘सीधे मोदी के जाल में फंसना’’ कह कर इसकी आलोचना करते हैं।

परंतु राष्ट्रपति प्रणाली इसके ढांचे के कारण, एकल-व्यक्ति शासन के खिलाफ सर्वोत्तम सुरक्षा है। अमरीका के निर्माताओं ने इंग्लैंड से स्वतंत्रता पाने के बाद उस प्रणाली का अविष्कार विशेष रूप से इसीलिए किया कि ब्रिटिश-प्रकार जैसे राजशाही शासन से बच सके। उनकी प्रणाली शक्तियों को सरकार की एक ही शाखा में केंद्रित होना असंभव बनाती है। वहां राष्ट्रपति और सांसद स्वतंत्र रूप से निर्वाचित होते हैं और दोनों की शक्तियां पृथक हैं। 233 वर्षों में कोई अमरीकी राष्ट्रपति कभी तानाशाहीपूर्ण शासन करने में कामयाब नहीं हुआ। यहां तक कि इन दिनों हम देख रहे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तानाशाह प्रवृत्तियां उनकी संसद द्वारा कैसे दबाई जा रही हैं।

दरअसल यह हमारी अपनी संसदीय प्रणाली है जो निरंकुश प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देती है। कारण स्पष्ट हैः संसदीय प्रणाली विधायी और कार्यकारी दोनों शक्तियों को प्रधानमंत्री कार्यालय में समाहित कर देती है। भारत का छद्म संघवाद भी हमारे प्रधानमंत्री को हर राज्य में गवर्नर नियुक्त करने और फिर इसके जरिए समूचे देश को नियंत्रित करने की शक्ति देता है।

मोदी कभी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने की सोचें इसकी संभावना नहीं, क्योंकि इससे उनकी शक्तियों में कटौती होगी। वर्ष 1970 के दशक में इंदिरा गांधी ने भी समान कारण के चलते वह प्रणाली अपनाने की अपनी योजना छोड़ दी थी। कांग्रेस नेता एआर अंतुले ने यह 1994 में स्वीकार कियाः ‘‘इंदिरा गांधी तानाशाह बनना चाहती थीं, इसलिए अक्तूबर 1976 में वह राष्ट्रपति प्रणाली चाहती थीं। परंतु आप राष्ट्रपति प्रणाली में एक तानाशाह नहीं बन सकते।’’

कांग्रेस का अन्य तर्क कि राष्ट्रपति प्रणाली भारत की विविधता के अनुरूप नहीं, यह भी गलत धारणा है। वह प्रणाली विविध समाज के लिए ज्यादा उपयुक्त है। क्योंकि यह ढांचागत रूप से विकेंद्रीकृत है। उसमें हमारी प्रणाली के उलट, राज्य और स्थानीय सरकारों के पास असल शक्तियां हैं। विविध समाजों को विकेंद्रीकृत प्रणाली की आवश्यकता होती है, ताकि राष्ट्रीय बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों को स्थानीय स्तर पर रोका जा सके। यही कारण है कि कांग्रेस नेता मौलाना आजाद और अन्यों ने स्वतंत्र भारत के लिए एक ऐसी प्रणाली सुझाई जिसमें राज्य सरकारों को ज्यादा स्वायत्तता हो। परंतु उनकी सलाह की उपेक्षा की गई।

राष्ट्रपति प्रणाली के प्रति अयूब की आपत्तियां फिर भी कुछ जानकारी पर आधारित हैं। वह तर्क देते हैं कि भारत की राजनीतिक अस्वस्थता किसी प्रणाली द्वारा दूर नहीं हो सकती, क्योंकि हम बुरी राजनीतिक संस्कृति से पीडि़त हैं। भारत के राजनेताओं में वैचारिक प्रतिबद्धता की कमी है, और जाति व सांप्रदायिक विचार चुनावों में बड़ी भूमिका निभाते हैं। ‘‘यह एक सामाजिक विषाणु है जो राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने से मिट नहीं सकता,’’ वह लिखते हैं। अयूब यह भी तर्क देते हैं कि क्योंकि भारत में ‘‘व्यवहार्य पार्टी ढांचे की कमी है, राष्ट्रपति प्रणाली निर्वाचित सांसदों द्वारा गैर जिम्मेदार व्यवहार को और बढ़ावा देगी।’’

अमरीकी संविधान के मुख्य रचनाकार जैम्स मैडिसन ने एक बार लिखा था, ‘‘अगर मनुष्य फरिश्ते होते तो किसी सरकार की आवश्यकता ही नहीं होती।’’ सरकार की एक अच्छी प्रणाली की आवश्यकता ठीक इसलिए है क्योंकि राजनेताओं में पॉवर का लालच है और आम जनता में संकीर्णता। राष्ट्रपति प्रणाली का ढांचा इन मानवीय दोषों के नुकसान को बहुत कम कर देता है। यह शक्तियों को कई प्रकार से विभाजित और पृथक करता है ताकि नेताओं को अपने राजनीतिक लाभ के लिए बिकने का लालच कम हो। और इसके चुनाव कई अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में होते हैं — शहर के अधिकारियों के लिए नगर पालिका, हाउस और सेनेट के लिए राज्य स्तरीय, और राष्ट्रपति के लिए राष्ट्रव्यापी — जो नस्लीय या सांप्रदायिक ताकतों के लिए बहुमत जुटाना मुश्किल बना देते हैं।

जहां तक अयूब का प्रश्न भारत में पार्टी ढांचे की कमी को लेकर है, अमरीका की द्विदलीय व्यवस्था राष्ट्रपति प्रणाली का परिणाम है, उसकी सफलता का कारण नहीं। अमरीका में दो प्रमुख पार्टियों का विकास इसके राष्ट्रव्यापी राष्ट्रपति चुनावों के कारण ही हुआ है। ऐसे चुनाव छोटी पार्टियों को मध्यमार्गी मंचों पर राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल होने के लिए बाध्य करते हैं। भारत को भी ऐसे ही परिणाम की सख्त आवश्यकता है।

बालाजी दरअसल राष्ट्रपति प्रणाली की आलोचना नहीं करते, पर उन सब दोषों पर दुःख जरूर प्रकट करते हैं जो मौजूदा प्रणाली की देन हैंः ‘‘सत्ता का केंद्रीकरण, निर्णय लेने के अलोकतांत्रिक तरीके, और चुनावों में आपराधिक साठगांठ पर धन का प्रभाव।’’ अगर वह सचमुच राष्ट्रपति प्रणाली पर विचार करें वह पाएंगे कि यह इन सब मर्जों की दवा है। उस प्रणाली में शक्तियां विभाजित और पृथक हैं ताकि केंद्रीकरण से बचा जाए और एक विचारशील लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुनिश्चित हो सके। वह प्रणाली अधिक लोकतंत्र उपलब्ध करवाती हैः अधिक विकेंद्रीकरण, अधिक प्रत्यक्ष निर्वाचित पदाधिकारी, और अधिक बार होने वाले चुनाव।

हम सब मन ही मन जानते हैं कि अपनी मौजूदा शासन प्रणाली के कारण हम एक महान राष्ट्र की तरह व्यवहार नहीं कर रहे। परंतु अगर हम कठिन परिश्रम करें और राष्ट्रपति प्रणाली अपना लें, हम भारत को अपने सपनों का देश बनाने की शुरुआत कर सकते हैं।

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 20 अगस्त 2020 के अंक में प्रकाशित।

 

राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने से सही चलेगा लोकतंत्र: शशि थरूर

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