अमरीकी इतिहास के 230 वर्षों में उनका एक भी राष्ट्रपति तानाशाह बनने में सफल नहीं हुआ, पर भारत में मात्र 70 वर्षों में हम कम से कम दो ऐसे प्रधानमंत्री देख चुके हैं, जो निरंकुश बन गए

[भानु धमीजा]

डोनाल्ड ट्रंप का नाटकीय उदय और पतन अमरीकी राष्ट्रपति प्रणाली के आकर्षण को गहराई से दिखाता है। उस प्रणाली ने एक गैर राजनीतिज्ञ को सर्वोच्चत्तम पद पर पहुंचने की अनुमति दी, पर जब वे मुख्य कार्यकारी बन गए तो इसने उनकी अति महत्त्वाकांक्षा पर लगाम लगाई, उन्हें उत्तरदायी बनाया, और किसी भी अयोग्यता या दुर्व्यवहार पर दंडित किया। इनमें से कोई भी विशेषता भारतीय संसदीय प्रणाली की सरकार में नहीं मिलती।

ट्रंप एक राजनीतिक नौसिखिया थे जिन्होंने 10 गवर्नरों, पांच सेनेटरों और एक विश्व प्रसिद्ध प्रतिद्वंद्वी हिलेरी क्लिंटन को हराकर 2016 का राष्ट्रपति चुनाव जीता। वह जीते क्योंकि बहुत से अमरीकियों ने उनके उच्च वर्ग विरोधी (anti elitism) अधिक रोजगार, निष्पक्ष व्यापार, और एक मजबूत आर्थिकी के संदेश को पसंद किया। उन्होंने आतंकवाद और अवैध अप्रवासियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया। ट्रंप लोगों की भावनाओं को उछालने लगे, परंतु दशकों के विदेशी युद्धों और बहु-राष्ट्रवाद के बाद बहुत से लोगों ने उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को पसंद किया। उन्होंने देश की ‘इलेक्टोरल कालेज’ प्रणाली के तहत कुल पड़े वोटों के बजाय अमरीका की ‘स्विंग स्टेट्स’, जहां वोटर डावांडोल थे, पर ज्यादा ध्यान देते हुए चुनाव स्पष्टता से जीत लिया।

ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति बनने वाले अकेले गैर-पेशेवर राजनेता नहीं हैं। पिछले 10 राष्ट्रपतियों में से आधे राजनीति में आने से पूर्व अन्य व्यवसायों में थे। जॉर्ज बुश जूनियर ने नेशनल गार्ड में लड़ाकू विमान उड़ाए, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल गए, तेल उद्योग में काम किया, और एक बेसबाल टीम के मालिक बने। उनके पिता जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश, जो अमरीका के 41वें राष्ट्रपति थे, उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नौसेना में सेवाएं दीं और फिर एक सफल तेल कंपनी की स्थापना की। रोनाल्ड रीगन एक रेडियो कमेंटेटर और सफल हालीवुड अभिनेता थे। जिम्मी कार्टर ने नौसेना में सेवाएं दीं और फिर पारिवारिक कृषि फार्म चलाया। और जेराल्ड फोर्ड हाउस ऑफ रिपे्रजेंटेटिव में निर्वाचित होने से पहले नौसेना में लेफ्टिनेंट कमांडर थे।

भारत में एक गैर-राजनीतिक नेता के प्रधानमंत्री बनने के अवसर शून्य हैं। हमारा संविधान कहता है कि वह सांसद और बहुमत दल के नेता हों। क्योंकि संसदीय उम्मीदवार खुले प्राथमिक चुनावों से नहीं चुने जाते, इसलिए उन्हें सांसद का टिकट पाने के लिए पार्टी नेताओं से खूब संबंध बनाने होते हैं। इसलिए केवल पार्टी के वफादार और चाटुकार ही अकसर नेता बन पाते हैं। यह व्यवस्था हमारे देश को बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली लोगों से वंचित कर देती है जो मुख्य कार्यकारी की भूमिका में जीवन के असली अनुभव ला सकते हैं।

राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप उनके देश की प्रणाली द्वारा कार्यकारी मनमानी पर लगाए गए गंभीर प्रतिबंधों को समझने में असफल रहे। मुस्लिम अप्रवासियों पर लगाया गया उनका प्रतिबंध कानूनी चुनौतियों द्वारा रोक दिया गया, जब तक उन्होंने धर्म को इसके आधार के रूप में नहीं हटाया। बिना वैध दस्तावेज पहुंचे अप्रवासियों के बच्चों को अलग कर देने के उनके प्रयासों पर अभी भी अदालतों में मुकदमे चल रहे हैं। और मैक्सिको की सीमा पर दीवार बनाने का उनका प्रयास कमजोर कर दिया गया, क्योंकि अमरीकी कांग्रेस ने उन्हें धन देने से इनकार कर दिया। ओबामाकेयर को निरस्त करने के उनके एजेंडा कार्यक्रम को अभी भी सेनेट ने रोक रखा है।

कुछ ही मनमानियां करने में ट्रंप सफल रहे। जैसे कि ईरान परमाणु और पेरिस जलवायु समझौतों को रद्द करना। वह ऐसा करने में इसलिए सफल रहे कि क्योंकि उन्हें पूर्व राष्ट्रपति द्वारा की गई मनमानी के तौर पर देखा गया। बराक ओबामा बिना सेनेट के बहुमत की मंजूरी से उनमें शामिल हुए थे, जो सभी अंतरराष्ट्रीय संधियों के लिए अमरीका के संविधान की शर्त है।

हमारे प्रधानमंत्री ऐसी रुकावटों का सामना नहीं करते। वे बिना संसदीय मंजूरी विदेशों से संधियां कर सकते हैं। वह मर्जी से अध्यादेश जारी कर सकते हैं, जिनकी केवल सीमित न्यायिक समीक्षा हो सकती है। वे अपने पंसदीदा कार्यक्रमों के लिए बिना संसद की मंजूरी स्वतंत्रता से धन निकाल सकते हैं। और प्रधानमंत्री अपनी सरकार के एजेंडा के लिए कोई भी कानून बना या बदल सकते हैं, क्योंकि हमारी प्रणाली प्रधानमंत्री को कार्यकारी और विधायी दोनों शक्तियां देती है। यह सब हमारे प्रधानमंत्रियों को निरंकुश शक्ति देता है जिसका दुरुपयोग किया जा सकता है।

अमरीकी प्रणाली ने ट्रंप को केवल कई मनमाने कार्य करने से ही नहीं रोका, इसने रोजमर्रा उनसे उत्तर भी मांगा। वह 30 से अधिक विभिन्न जांचों का सामना कर रहे हैं, जिनकी निगरानी अदालतें या अमरीकी विधायिका कर रही है। रूस के साथ मिलीभगत के आरोपों की विशेष जांच, जिसे उनके अपने विधि विभाग ने संचालित किया, ने ट्रंप के सहयोगियों को 199 आपराधिक आरोप, 37 अभियोग या दोषी करार और पांच जेल सजाएं दिलवाईं।

एक भारतीय प्रधानमंत्री को इस प्रकार उत्तरदायी कभी नहीं बनाया जा सकता। उसके पास संसद में शर्तिया बहुमत होता है, इसलिए कोई विधायी जांच निरर्थक है। वह संसद में शामिल होने या प्रश्नों के उत्तर देने के लिए बाध्य नहीं है। सांसदों द्वारा उठाए गए प्रश्नों के उत्तर उनके किसी उपमंत्री द्वारा दिए जा सकते हैं, जिनकी आगे कोई स्वतंत्र जांच नहीं होती। और भारत की संसद को एक प्रधानमंत्री की जांच शुरू करने का कोई अधिकार नहीं है।

यह सब हमें इस दुखद तथ्य तक ले आता है कि हमारी प्रणाली में एक सरकार कभी जिम्मेदार नहीं ठहराई जाती। इसे मनमाने काम करने से नहीं रोका जा सकता, और इसे एक स्वतंत्र विधायिका द्वारा फटकारा नहीं जा सकता।

जहां तक दंडित करने की बात है, ट्रंप को जनता और विधायिका द्वारा बुरी तरह दंडित किया गया है। वर्ष 2018 के मध्यावधि चुनाव में उनकी पार्टी ने हाउस ऑफ रिपे्रजेंटेटिव्स का नियंत्रण खो दिया, और नतीजा था जांचों का सिलसिला। वर्ष 2019 में सत्ता के दुरुपयोग और कानून बाधित करने पर सदन ने उनके खिलाफ महाभियोग पारित कर दिया। और 2020 के चुनाव में ऐसा लगता है कि वह राष्ट्रपति पद के लिए फिर से चुने नहीं जाएंगे।

हमारी संसदीय प्रणाली में न मध्यावधि चुनाव हैं, और न ही एक प्रधानमंत्री के खिलाफ महाभियोग का प्रावधान। जब तक उसके पास संसद में बहुमत कायम है वह कितने भी दुष्टतापूर्ण व्यवहार के बावजूद अपना पद बनाए रख सकता है।

अमरीकी इतिहास के 230 वर्षों में उनका एक भी राष्ट्रपति तानाशाह बनने में सफल नहीं हुआ, पर भारत में मात्र 70 वर्षों में हम कम से कम दो ऐसे प्रधानमंत्री देख चुके हैं, जो निरंकुश बन गए।

अमरीकी प्रणाली ने अपने लोगों को एक बेहतर और सुरक्षित लोकतंत्र देना बार-बार सिद्ध किया है। हमें उस प्रणाली के विरुद्ध अपने पूर्वाग्रह छोड़ देने चाहिएं और इसे अपनाने पर विचार करना चाहिए।

[यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 2 नवंबर 2020 के अंक में प्रकाशित]

क्या है राष्ट्रपति प्रणाली?