गांधी ने शक्ति के केंद्रीकरण के खतरों को ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से पहचाना था। 1909 में उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा कि इंग्लैंड की संसद ‘‘एक बांझ स्त्री और एक वेश्या की तरह’’ थी, क्योंकि यह ‘‘मंत्रियों के नियंत्रण के अधीन’’ थी। उन्होंने चेतावनी दी, ‘‘अगर भारत इंग्लैंड की नकल करता है, यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह बर्बाद हो जाएगा।’’…

[भानु धमीजा]

महात्मा गांधी भारत के संविधान को पसंद नहीं करते। उनकी सहभागिता के बिना बनाए गए और उनकी हत्या के दो साल बाद अंगीकृत हमारे संविधान का ढांचा और शक्तियों का संतुलन उनकी जानी-मानी प्राथमिकताओं से मेल नहीं खाता। वह हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्षता के प्रावधानों पर भी आपत्ति करते। और वर्तमान समय में जो हमारा संविधान बन गया है, वह तो महात्मा को भयभीत कर देता।

गांधी ने एक स्वतंत्र भारतीय संविधान के लिए अपने विचार संपूर्ण रूप से विकसित नहीं किए थे, परंतु वह बहुत करीब थे। वर्ष 1946 में उनके विचारों का उल्लेख, ‘स्वतंत्र भारत का गांधीवादी संविधान’ पुस्तक में किया गया था, जिसे गांधी के एक सहयोगी श्रीमन नारायण अग्रवाल ने लिखा था, जो बाद में गुजरात के राज्यपाल भी बने।

अग्रवाल ने ग्राम पंचायतों पर आधारित विकेंद्रीकृत प्रशासन की गांधी की परिकल्पना प्रस्तुत की। इस ‘विकेंद्रीकृत ग्राम समुदाय’ को स्थानीय स्तर की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिकी और प्रशासन पर पूर्ण स्वतंत्रता होती। पंचायत ग्रामीण कर्मचारियों, पटवारियों, पुलिस और यहां तक कि न्याय देने का नियंत्रण अपने पास रखती। करीब 20 गांवों से एक तालुका (जिला) बनता, जो एक ‘तालुका पंचायत’ निर्वाचित करते, और फिर एक ‘अखिल भारतीय पंचायत’। हर विधानमंडल एक अध्यक्ष और मंत्रियों का निर्वाचन करता, लेकिन वे पंचायत के सदस्य नहीं होते। इस प्रकार ‘‘विधायिका और कार्यपालिका के बीच कार्यों का संपूर्ण पृथक्करण होता।’’

गांधी ने ठीक ऐसे ही संविधान का प्रयोग लगभग एक दशक तक किया था। वर्ष 1938 में महाराष्ट्र की एक रियासत औंध के राजा भवनराव पंत ने अपना सिंहासन त्यागने का मन बनाया और एक संविधान बनाने में गांधी को मदद का निमंत्रण दिया, ताकि लोग अपनी व्यवस्था खुद चला सकें। गांधी ने पंचायतों पर आधारित ऐसे ढांचे का प्रस्ताव दिया जिसमें शासन के सभी पहलू नीचे से ऊपर की ओर बढ़ें। राजा के बेटे आपा पंत ने बताया कि गांधी ने कहा : ‘‘मेरे सपनों के आदर्श राज्य में शक्ति कुछ हाथों में सीमित नहीं होगी। एक केंद्रीकृत सरकार बोझिल, अकुशल, भ्रष्ट, अकसर क्रूर और हमेशा हृदयहीन बन जाती है।

सभी केंद्रीकृत सरकारें सत्ता-लोलुपों को आकर्षित करती हैं, जो शक्ति हासिल करते हैं और फिर इसे जबरदस्ती बनाए रखते हैं।’’ गांधी के दृष्टिकोण ने औंध के शिक्षा स्तर, अर्थ व्यवस्था और सामाजिक एकता को उन्नत किया। वर्ष 1948 में औंध भारतीय संघ में शामिल हो गया।

गांधी ने शक्ति के केंद्रीकरण के खतरों को ब्रिटिश संसदीय प्रणाली से पहचाना था। 1909 में उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा कि इंग्लैंड की संसद ‘‘एक बांझ स्त्री और एक वेश्या की तरह’’ थी, क्योंकि यह ‘‘मंत्रियों के नियंत्रण के अधीन’’ थी। उन्होंने चेतावनी दी, ‘‘अगर भारत इंग्लैंड की नकल करता है, यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह बर्बाद हो जाएगा।’’ उन्होंने एक बार ब्रिटिश विदेश मंत्री को उनके देश की प्रणाली के बारे में चेताया : ‘‘मेरा पूर्ण अस्तित्व इस विचार का विरोध करता है कि एक प्रणाली जिसे लोकतांत्रिक कहा जाता है उसमें एक व्यक्ति के पास निरंकुश शक्ति हो… मेरे लिए यह लोकतंत्र का खंडन है।’’

परंतु उस समय भारतीय संविधान बनाने वालों ने गांधी के अनुभव और विचारों की पूर्ण अवहेलना की और ब्रिटिश प्रणाली अपनाने का निर्णय ले लिया। नेहरू ने गांधी को 1945 में यह कहा कि कांग्रेस पार्टी ने ‘हिंद स्वराज’ में प्रस्तुत समाज के उनके दृष्टिकोण पर ‘‘कभी विचार ही नहीं किया’’ और ‘‘अपनाने की बात तो बहुत दूर है।’’ अगले साल कांग्रेस की ‘विशेषज्ञ समिति’ और संविधान सभा की ‘संघीय संविधान समिति’ के मुखिया के तौर पर नेहरू ने ठीक उसी प्रणाली को अपनाने पर जोर दिया जिसके खिलाफ गांधी ने सावधान किया था। भारतीय संविधान के इतिहासकार ग्रैनविल ऑस्टिन ने लिखा, ‘‘एक गांधीवादी संविधान पर लगता है कि एक क्षण भी विचार नहीं किया गया।’’

नेहरू ने तर्क दिया कि गांधी का दृष्टिकोण व्यवहारिक और आधुनिक नहीं था। उनके विचार में आंतरिक और बाहरी खतरों से निपटने, और आर्थिकी बढ़ाने, के लिए भारत को एक केंद्रीकृत संविधान की आवश्यकता थी। हिंदू-मुस्लिम फसादों और रियासतों की मांगों के चलते देश गंभीर पृथकतावादी दबाव में था। और भारत की आर्थिकी को केंद्रीकृत योजना, आधुनिक कृषि और उद्योग की आवश्यकता थी। नेहरू ने गांधी से पूछा, ‘‘एक ग्रामीण समाज और विकेंद्रीकृत संविधान के साथ, क्या भारत स्वयं को विदेशी आक्रमकता से बचाने में सफल होगा?’’ और ‘‘कब तक’’ आधुनिक आर्थिक आवश्यकताएं, ‘‘विशुद्ध ग्रामीण समाज में सही बैठेंगी?’’

एक बार जब नेहरू की समितियों ने केंद्रीकृत संविधान पर निर्णय ले लिया, संविधान सभा इसे अंगीकृत करने की स्वीकृति देती चली गई। यहां तक कि सभा में गांधी के राजनीतिक विरोधी और ‘प्रारूप समिति’ के अध्यक्ष अंबेडकर ने महात्मा के ग्राम आधारित संविधान का मजाक उड़ाया। ‘‘बुद्धिजीवी भारतीयों का ग्रामीण समुदाय के प्रति पे्रम असीमित ही नहीं, परंतु दयनीय है,’’ उन्होंने कहा। ‘‘गांव स्थानीयतावाद का गंदा नाला, अज्ञान की गुफा, संकीर्ण मानसिकता और सांप्रदायवाद के सिवा और क्या है?’’ परंतु जब गांवों को सिरे से उपेक्षित करने पर प्रारूप की तीखी आलोचना हुई तो पंचायतों को बढ़ावा देने के लिए एक अनुच्छेद ‘निर्देशक सिद्धांत’ के रूप में जोड़ दिया गया।

आज, जैसा कि गांधी को डर था, हमारे संविधान में शक्तियों का केंद्रीकरण विनाशकारी स्तर तक जा पहुंचा है। वर्ष 1976 में इंदिरा गांधी के 42वें संविधान संशोधन ने राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री के अधीन बना दिया। उसने प्रधानमंत्री को कानून बनाने पर ही निरंकुश शक्ति नहीं दी, बल्कि देश भर में गवर्नरों पर भी। और 1985 में दलबदल विरोधी कानून ने प्रधानमंत्री को पार्टी के सांसदों के वोट पर भी पूर्ण नियंत्रण सौंप दिया।

हमारे संविधान में धर्मनिरपेक्षता की व्यवस्था एक और क्षेत्र है जिसे गांधी नापसंद करते। भारतीय संविधान सरकारों को धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने की खुली छूट देता है। जबकि गांधी उन पर पूर्ण रोक लगाना चाहते थे। गांधी ने 1946 में लिखा : ‘‘अगर मैं तानाशाह होता, तो धर्म और सरकार अलग-अलग होते। मैं अपने धर्म की सौगंध खाता हूं, मैं इसके लिए मरने को तैयार हूं, परंतु यह मेरा व्यक्तिगत मसला है। सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं।’’

भारत ने ग्राम पंचायतों को सशक्त करने की गांधी की परिकल्पना आखिरकार 1992 में अपनाई। राजीव गांधी के 73वें संशोधन ने पंचायतों को स्व-शासन की संस्थाओं के तौर पर संवैधानिक दर्जा दिया, परंतु तब तक राज्य और केंद्र सरकारें अपनी शक्तियों की मोर्चेबंदी कर चुकी थीं। तीन दशक बाद भी पंचायतें अधिकार और संसाधनों को लेकर इतनी आत्मनिर्भर नहीं हुई हैं कि भारत के प्रशासन की मूल इकाई के रूप में काम कर पाएं। अब जबकि भारत की अखंडता और एकता खतरे में नहीं है, महात्मा की विकेंद्रीकृत संविधान की परिकल्पना को ताजा दृष्टिकोण से देखने का समय आ गया है।

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 2 अक्टूबर 2020 के अंक में प्रकाशित।