टाटा लिटरेचर लाइव 2018 (मुंबई लिटफेस्ट) में नवंबर 15, 2018 को ‘भारत को राष्ट्रपति प्रणाली की आवश्यकता है’ विषय पर एक बहस का आयोजन हुआ। इस अवसर पर प्रस्ताव के पक्ष में भानु धमीजा ने कमान संभाली। प्रस्तुत हैं उनके वक्तव्य के मुख्य अंश…

[भानु धमीजा]

नमस्कार।

इससे पहले कि मैं हमारे देश के लिए राष्ट्रपति प्रणाली के फायदों के बारे में बात रखूं…

मैं एक अपील के साथ शुरुआत करना चाहूंगा… इसे एक दलगत मसला न बनाएं। हमारे देश की शासन प्रणाली हमारे बच्चों के भविष्य के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसलिए इसे आरोप-प्रत्यारोप का खेल बनाने के बजाय, आइए बात इस आधार पर आरंभ करें कि नेहरूजी से लेकर मोदीजी तक हमारे सभी प्रधानमंत्री देशभक्त हैं। वे वही करते हैं जो उनके अनुसार देश के हित में होता है। आइए व्यवस्था के विषय में बात करें, लोगों के बारे में नहीं।

हमारी प्रणाली की असफलताएं भारतीय जनमानस की विफलताएं नहीं हैं। जब भी कोई राष्ट्रीय समस्या सामने आती है, तो हमारी अपने देशवासियों पर दोष मढ़ने की प्रवृत्ति है कि वे भ्रष्ट, निरक्षर या बेवकूफ हैं। परंतु अगर ये विशेषण सही हैं, तो ऐसा क्यों है कि जब भारतीय दूसरे देशों में प्रवास पर जाते हैं, तो हम उनके सर्वोच्च उत्पादक और सर्वाधिक आदरणीय नागरिक बन जाते हैं?

और यह भी समझिए कि वाकपटुता वास्तविकता नहीं होती। हमें उन लोगों से प्रभावित नहीं होना चाहिए जो हमें भारत के प्राचीन वैभव के विषय में भावुक बनाते हैं। हम शानदार विरासत वाले महान लोग हैं। परंतु महानता हर दिन हासिल करनी पड़ती है। भारत के संपन्न इतिहास के बारे में बात करना राजनीतिक जीत की युक्ति तो हो सकती है, परंतु यह भविष्य के शासन की रणनीति हरगिज नहीं।

अमरीका के समान राष्ट्रपति प्रणाली पर विचार करने के मेरे तर्कों में मेरा निश्चित तौर पर यह तात्पर्य नहीं है कि अमरीकावासी बेहतर लोग हैं। परंतु उनके शासन की प्रणाली जरूर बेहतर है।

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शासन की राष्ट्रपति प्रणाली है क्या?

इसे समझना आसान है। इसमें सरकार की समान तीन शाखाए हैं – कार्यपालिका, विधायिका, और न्यायपालिका – परंतु हमारी प्रणाली के विपरीत उन्हें सही अर्थों में पृथक रहने के लिए बनाया गया है। साथ ही हर शाखा का सर्वोच्च अधिकारी जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित किया जाता है। और अमरीका में न्यायाधीश खुद को स्वयं नियुक्त नहीं करते। उन्हें राष्ट्रपति और सेनेटरों द्वारा संयुक्त गहन सार्वजनिक जांच के बाद तैनात किया जाता है।

ये मामूली भिन्नताएं नहीं हैं। ये हर शाखा को स्वतंत्र बनाती हैं, और इस प्रकार कि वे अन्य शाखाओं पर सचमुच एक नियंत्रण के रूप में कार्य करने के योग्य हों।

जब कार्यपालिका व विधायिका का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर हो, जैसा भारत में है, एक का दूसरे पर नियंत्रण रखना अर्थहीन हो जाता है।

अमरीका में राज्य सरकारें केंद्र द्वारा भंग नहीं की जा सकतीं। अमरीका में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो हमारे बेतुके और बहुत दुरुपयोग में लाए गए ‘राष्ट्रपति शासन’ के नजदीक भी आता हो।

और अंत में, उस प्रणाली के अंतर्गत, स्थानीय सरकारें स्वयं राज्य सरकारों द्वारा बनाई जाती हैं। अमरीका में लगभग 90,000 स्थानीय सरकार निकाय हैं। स्कूल डिस्ट्रिक्ट्स से लेकर बिजली-पानी की सार्वजनिक सुविधाओं और एंबुलेंस सेवाओं तक। सभी निकाय स्थानीय निवासियों द्वारा स्वयं चलाए जाते हैं।

तो बस यही है। तीन प्रकार की सरकारें : संघीय, राज्य और स्थानीय। प्रत्येक में तीन पृथक शाखाएं। एक-दूसरे से सही अर्थों में पृथक। जो नियंत्रणों और संतुलनों की एक प्रणाली के तहत काम कर रही हैं।

वह प्रणाली 1787 में जेम्स मैडिसन, जॉर्ज वाशिंगटन और अन्यों ने ईजाद की थी, जो ब्रिटिश संसदीय प्रणाली की असफलताओं से गहराई तक परिचित थे। उन्होंने इसे एक बेहतर विकल्प के तौर पर तैयार किया।

और मेरे विचार में हम सब सहमत होंगे कि इस प्रणाली ने अमरीका के लिए काफी अच्छा काम किया है।

राष्ट्रपति प्रणाली के भारत को मुख्य लाभ क्या हैं

  1. इसके नाम के विपरीत, राष्ट्रपति प्रणाली एकल व्यक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं की जा सकती। राज्य सरकारें पूरी तरह केंद्र के नियंत्रण से परे हैं। यहां तक कि केंद्र में भी राष्ट्रपति, विधायिका को नियंत्रित नहीं करता। वह कानून नहीं बना सकता। वह यह फैसला नहीं कर सकता कि कौन सा कानून लागू किया जाए। वह युद्ध की घोषणा नहीं कर सकता। वह सेना को धन भी नहीं दे सकता। वह जांच एजेंसियों का मनमाना इस्तेमाल नहीं कर सकता। यहां तक कि विधायिका के अनुमोदन बिना वह अपनी कैबिनेट भी नहीं चुन सकता।
  2. राष्ट्रपति प्रणाली भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी बेहतर सुरक्षा उपलब्ध करवाती है। सभी मंत्री सीधे विधायिका को जवाब देते हैं। यहां तक कि उनके रक्षा मंत्री को भी सार्वजनिक रूप से टीवी पर कठिन प्रश्नों के उत्तर देने पड़ते हैं।
  3. राष्ट्रपति प्रणाली सरकार की भूमिका भी सीमित करती है। हर नए काम के लिए विधायिका के अनुमोदन की आवश्यकता होती है, और उन्हें अदालतों द्वारा रोका भी जा सकता है। यह सरकारों को टैक्स दाताओं का धन खैरात में लुटाने से रोकता है। परंतु यहां, हमारी सरकारें न केवल हमारे टैक्स से एकत्रित धन का वोट खरीदने के लिए दुरुपयोग करती हैं, बल्कि हमारे नागरिकों को सरकार पर और निर्भर भी बनाती हैं।
  4. राष्ट्रपति प्रणाली वोट बैंक की राजनीति का भी खात्मा करती है। इसमें उम्मीदवारों का चुनाव पार्टी आकाओं द्वारा जाति या धर्म के आधार पर नहीं किया जाता। उन्हें प्रारंभिक चुनावों के जरिए विशाल चुनाव क्षेत्रों में जीत हासिल करनी पड़ती है। उदाहरण के तौर पर, वोट बैंक राजनीति के आधार पर किसी भी सेनेटर के लिए पूरे राज्य भर में चुनाव में जीतना लगभग असंभव है।
  5. एक और लाभ जिसकी आज के भारत में बहुत अधिक आवश्यकता है, वह है कार्यकुशल और पारदर्शी न्यायपालिका। उनकी न्यायपालिका विकेंद्रीकृत है, क्योंकि यह राज्यों द्वारा व्यवस्थित होती है। और यह जवाबदेह है, क्योंकि केंद्र व राज्य विधायिका अधीनस्थ न्यायालय बना सकती हैं या उनमें सुधार ला सकती हैं।
  6. अंत में, और हमारे लिए सर्वाधिक आवश्यक, राष्ट्रपति प्रणाली एक विविध समाज के लिए बनाई गई है। विभिन्न संस्कृति और नस्ल के लोगों के लिए यह स्थानीय सरकारों को स्वायत्तता देकर एक सच्चा संघवाद उपलब्ध करवाती है। अमरीका भारत से भी अधिक विविध देश है। इसमें सात भिन्न नस्लों के लोग रहते हैं, जो विश्व के हर धर्म से हैं, और 350 अलग-अलग भाषाएं बोलते हैं।

विविध समाज को विकेंद्रीकृत शासन प्रणाली की आवश्यकता होती है। परंतु हमारी तथाकथित ‘मजबूत केंद्र’ पर आधारित प्रणाली इस मामले में पूरी तरह से विफल है।

एक मिथक का पर्दाफाश

अपनी बात समाप्त करने से पहले, मैं एक आम मिथक का पर्दाफाश करना चाहूंगा कि अमरीकी प्रणाली एक व्यक्ति की तानाशाही है।

सच्चाई दरअसल ठीक विपरीत है। यह हमारी भारत की प्रणाली है जो तानाशाह पैदा करती है। अमरीकी इतिहास के 230 वर्षों में कोई राष्ट्रपति कभी भी तानाशाही करने में सफल नहीं हुआ। परंतु 70 सालों के हमारे अपने इतिहास में, हम कम से कम दो प्रधानमंत्रियों का हवाला दे सकते हैं जो बहुत निरंकुश रहे हैं।

वास्तविकता यह है कि वह प्रणाली तानाशाहों को धरती पर पटक देती है। डोनाल्ड ट्रंप के पर उनके पद ग्रहण करने के कुछ दिन में ही कतरने शुरू हो गए थे। और अमरीका के ताजा मध्यावधि चुनावों ने उनका कद और भी छोटा कर दिया है। दरअसल ट्रंप की कहानी राष्ट्रपति प्रणाली की दो मुख्य शक्तियों पर प्रकाश डालती है : एक गैर-राजनीतिक व्यक्ति सबसे बड़े पद पर पहुंच सकता है, और अगर वह अधिक महत्त्वाकांक्षा के कारण असफल या निरंकुश होता है तो उसे तुरंत रोक दिया जाता है।

देवियो व सज्जनों, कोई तो कारण है कि अंबेडकर, पटेल और वाजपेयी जैसी विभूतियों का मानना था कि भारत को राष्ट्रपति प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का इस्तेमाल करना चाहिए। मुझे विश्वास है कि आप इस महत्त्वपूर्ण मामले की आगे जांच-पड़ताल करेंगे।

धन्यवाद। जय हिंद!

Bhanu Dhamija Tata Litfest Debate India Needs Presidential System

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 28 नवंबर 2018 के अंक में प्रकाशित।

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