भारत एक असाधारण राजनीतिक पंथ का पुरोधा होना चाहिए, एक ऐसी अद्वितीय विचारधारा जिसे ‘भारतीय विशिष्टतावाद’ कहा जा सके…

[भानु धमीजा]

भारत एक विशिष्ट राष्ट्र है। इसका यशस्वी अतीत और गहन विविधता इसे अद्वितीय बनाते हैं। यह एक विशेष देश है, जैसा ‘विश्व गुरु’ के प्रचारक, हमारे बहुलवादी धर्म, सार्वभौमिकता, पर्यावरणवाद, योग, आयुर्वेद, आदि, का हवाला देते हुए हमें अकसर याद दिलाते हैं। समय आ गया है कि भारत इन मजबूतियों का लाभ उठाए और नए दूरदर्शी सिद्धांत स्थापित करे जो दूसरे लोकतंत्रों को भी प्रेरित करें। भारत एक असाधारण राजनीतिक पंथ का पुरोधा होना चाहिए, एक ऐसी अद्वितीय विचारधारा जिसे ‘भारतीय विशिष्टतावाद’ (Indian Exceptionalism) कहा जा सके।

अमरीकी विशिष्टतावाद (American Exceptionalism) का यदि परीक्षण करें तो हम उनकी अद्वितीय विचारधारा को निम्न सिद्धांतों में निहित पाते हैं: स्वतंत्रता, समतावाद, व्यक्तिवाद, धर्मनिरपेक्षता, गणतंत्रवाद, लोकतंत्र, संघवाद, और हस्तक्षेप रहित अर्थव्यवस्था। ये सिद्धांत, जो वर्ष 1787 में देश के संविधान में प्रतिष्ठापित किए गए, अमरीका को अन्य देशों, विशेषतया यूरोप और रूस से अलग खड़ा करते हैं। अधिकतर यूरोपीय देश गणराज्य या संघ नहीं थे, न ही वे व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं, समान अधिकारों, या हस्तक्षेप रहित बाजारों की गारंटी दे सकते थे। आज अमरीका के लोगों को इन सिद्धांतों पर अत्यधिक गर्व है और इनकी सुरक्षा के लिए कई अपना जीवन तक दांव पर लगाने को तैयार हैं।

हमारा संविधान भी लगभग समान सिद्धांतों का अनुमोदन करता है। इसकी प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता, बंधुता (‘‘व्यक्ति की गरिमा’’) सम्मिलित हैं। और यह देश को लोकतंत्रात्मक, गणराज्य, और पंथनिरपेक्ष भी घोषित करता है।

हालांकि, दोनों देशों की विचारधारा में तीन बड़े अंतर हैं…

प्राचीनतम और विशालतम लोकतंत्र एक-दूसरे से अत्यधिक भिन्न

अमरीका हस्तक्षेप रहित पूंजीवाद में विश्वास रखता है, जबकि भारत स्वयं को समाजवादी घोषित कर सरकार द्वारा केंद्रीकृत प्लानिंग में लीन है। अमरीका के संघवाद में राज्य सरकारें स्वायत्तशासी हैं, परंतु भारत में उन्हें केंद्र द्वारा नियंत्रित और भंग किया जा सकता है। और धर्मनिरपेक्षता के विषय में, अमरीका सरकार को धर्म से अलग रखता है जबकि भारत सरकारों को धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने की इजाजत देता है। यही अंतर हैं जो भारत को एक विशिष्ट नया राजनीतिक पंथ तैयार करने का अवसर उपलब्ध करवाते हैं।

हिंदू राष्ट्रवादियों की तो भारतीय विशिष्टतावाद के लिए इससे भी उच्च अभिलाषाएं हैं। जैसा कि भाजपा के मुख्य विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानववाद’ के अपने दर्शन में वर्णन किया है, हिंदू राष्ट्रवादी ‘धर्म’ को भारत का नया राजनीतिक पंथ बनाना चाहते हैं। वे आज की धर्मनिरपेक्षता को निकाल फेंकना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त वे समुदाय या परिवार को भारत के संविधान की आधारभूत नींव बनाना चाहते हैं। और नागरिकों के कर्त्तव्यों को नागरिक अधिकारों के समान ही महत्त्वपूर्ण। वे देश के वर्तमान संघवाद से भी असहमत हैं और भारत को एक एकात्मक देश बनाना चाहते हैं। यह दृष्टिकोण व्यावहारिक नहीं है, जैसा हम आगे देखेंगे।

परंतु ये विचार और पश्चिम से मतभेद भारतीय विशिष्टतावाद के तीन मूल सिद्धांत हो सकते हैं। वे हैंः बहुसंस्कृतिवाद, समुदायवादिता, और अटल-संघवाद।

बहुपंथीय विश्व के लिए एक नई राह

विश्व भर के लोकतंत्र बहुपंथीय समाजों की मांगें पूरी करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भारत अगर राह दिखा पाए तो यह एक महान उपलब्धि होगी। हमारा राष्ट्र अत्यधिक विविध है इसलिए बहुसंस्कृतिवाद के लिए नया सिद्धांत तैयार करने की विशिष्ट स्थिति में है।

हमारे विकल्प ये हैंः वर्तमान धर्मनिरपेक्षता जारी रखें, अमरीका जैसी धर्मनिरपेक्षता अपनाएं, धर्म राज्य की स्थापना करें, या कुछ नया तैयार करें। भारत की मौजूदा स्थिति, जहां सरकार खुलकर धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो सकती है, स्पष्टतया कामयाब नहीं है। इससे हर तरफ तुष्टिकरण, वोट-बैंक की राजनीति और आक्रोश पैदा हुआ है। परंतु धर्म राज्य भी उत्तर नहीं है। वह केवल सांप्रदायिक तनाव बढ़ाएगा और भारत को पाकिस्तान व ईरान जैसे धर्मतांत्रिक देशों की कतार में खड़ा कर देगा। यही नहीं ‘धर्म’ (जो स्वयं उपाध्याय के अनुसार हर व्यक्ति के लिए भिन्न है) को संहिताबद्ध करना अव्यावहारिक है।

‘धर्म राज्य’ के समर्थकों को इजरायल का अध्ययन करना चाहिए। उस देश में 76 प्रतिशत यहूदी हैं (भारत में हिंदू जनसंख्या 80 प्रतिशत है)। इजरायल अपनी आजादी के 70 वर्षों के बाद भी ऐसा संविधान अंगीकृत करने में सफल नहीं हुआ है जो इसे ‘यहूदी’ और ‘लोकतांत्रिक’, दोनों बनाता हो। इजरायल ने सरकार की तात्कालिक एक प्रणाली अपनाई है ताकि यह एक देश के रूप में कार्य कर पाए। परंतु यह लोकतंत्र के लिए कोई आशापूर्ण परिकल्पना नहीं है।

अमरीकी-प्रकार की धर्मनिरपेक्षता भेदभाव रहित है और पंथीय अभिव्यक्ति की पूरी इजाजत देती है, परंतु यह हानिकारक धार्मिक प्रथाओं के सुधार या समाज की नैतिकता ऊपर उठाने में सरकार को कोई भूमिका नहीं देती। क्योंकि धर्म हमेशा राजनीति से गुंथा रहता है, ऐसे मामलों में सरकार को भूमिका न देने से सांप्रदायिक संघर्षों के हिंसक रूप से सुलग उठने की संभावना बनी रहती है।

भारत एक ऐसी बहुसांस्कृतिक प्रणाली तैयार कर सकता है जो सरकार को धार्मिक व नैतिक मामलों में भूमिका भी दे, और धार्मिक बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों पर अत्याचार से भी रोक पाए। इसमें निम्न तत्त्व होंगेः

  1. सार्वभौमिक कानून, जैसे धार्मिक स्वतंत्रता, पारस्परिक आदर, पंथीय और धार्मिक समानता, सभी संविधान में संहिताबद्ध किए जाएं।
  2. सरकारें धार्मिक गतिविधियों से जुड़ सकती हैं, परंतु केवल विशिष्ट कानून के सहारे। ये कानून पहले संसद की एक विशिष्ट परिषद द्वारा पास किए जाएं, जहां सभी धर्मों का समान प्रतिनिधित्व हो।
  3. स्थानीय सरकारों को पंथीय या धार्मिक मसले संभालने की स्वायत्तता हो, परंतु उपर्युक्त दो शर्तों के साथ।

अधिकारों और कर्त्तव्यों का सही संतुलन

सभी लोकतंत्र चाहते हैं कि उनके नागरिक परिवार व समुदाय के प्रति अपनी जिम्मेदारियां निभाएं। संयुक्त परिवार और ग्राम पंचायतों की भारत की परंपराएं इसे वे नियम बनाने को आदर्श रूप में अनुकूल बनाती हैं, जो समुदाय की साझा भलाई को व्यक्तिगत स्वायत्तता और अधिकारों के साथ संतुलित करते हों। यह विचारधारा समुदायवादिता के रूप में जानी जाती है।

समुदायवादिता कठिन है, क्योंकि जब भी इसे किसी एक दिशा में अत्यधिक खींचा जाए तो यह असफल हो जाती है। जब सब कुछ एक समुदाय के रूप में चलाया जाता है (जैसा वामपंथ के साथ है), यह व्यक्तिगत उद्यम को नष्ट कर देता है। जब सरकारें ‘सामुदायिक भलाई’ के लिए उद्योग और कल्याण योजनाएं चलाती हैं (जैसा भारत के मौजूदा समाजवाद में है), तो लोगों की पहलकदमी थम जाती है। परंतु जब सरकार सामूहिक भलाई के लिए अनन्य रूप से जिम्मेदार बन जाती है जबकि व्यक्ति केवल अधिकारों का बलिदान देते हैं (जैसा कि पश्चिमी लोकतंत्रों के ‘सामाजिक अनुबंध’ का विचार है), परिवार और समुदाय बिखर जाते हैं।

भारत किसी प्रकार की नरम-सामुदायवादिता अपनाकर, परिवार और नागरिक समाज को सामाजिक नियंत्रण व सुधार के सह-घटक बनाकर एक नई राह दिखा सकता है। इसमें निम्न तत्त्व शामिल होंगेः

  1. स्थानीय समुदाय अपने क्रियाकलाप चलाने के लिए स्वयं जिम्मेदार हों। उदाहरणार्थ, स्थानीय रूप से निर्वाचित स्कूलबोर्ड विद्यालयों को चलाएं; एनजीओ और अलाभकारी संगठन जलस्रोतों की देखभाल करें; स्वयंसेवी समूह एंबुलेंस या अग्निशमन सेवाएं दें, आदि।
  2. हर नागरिक को कानून के तहत अपने अवयस्क बच्चों व बुजुर्ग माता-पिता के लिए मूलभूत सेवाएं उपलब्ध करवानी अनिवार्य हों। अगर संपत्ति के अधिकार न्यायोचित हो सकते हैं, तो ये कर्त्तव्य क्यों नहीं?

राष्ट्रीय अखंडता के साथ स्थानीय स्वायत्तता

एक पंथ के लोग व्यावहारिक या ऐतिहासिक कारणों से साथ-साथ रहते हैं, परंतु सभी लोकतंत्र अत्यधिक क्षेत्रीय स्वायत्तता से डरते हैं। स्व-शासन को अकसर संप्रभुता के पूर्वलक्षण के रूप में देखा जाता है।

यहां भी भारत की विविधता स्वायत्तता और संप्रभुता के मध्य सही संतुलन पाने का विशिष्ट अवसर उपलब्ध करवाती है। यह सिद्धांत ऐच्छिक-संघवाद (con-federalism, जहां राज्यों को संपूर्ण स्वायत्तता होती है) से अंतर करने के लिए अटल-संघवाद (pro-federalism) कहा जा सकता है।

इस संदर्भ में हिंदू राष्ट्रवादी भी सहमत हैं कि एकात्मक सरकार, जहां एक मजबूत केंद्र समूचे भूभाग पर शासन करता है, अव्यावहारिक है। सुशासन के लिए विकेंद्रीकरण आवश्यक है। साथ ही, केंद्रीकृत नियंत्रण स्व-शासन के सिद्धांतों के विपरीत है। परंतु राष्ट्रों को एक क्षेत्र का स्व-शासन अलगाववादी आंदोलन में बदलने के खिलाफ भी सुरक्षा चाहिए।

भारत एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली खोज सकता है, जहां क्षेत्रों के पास स्वायत्तता तो हो परंतु संप्रभुता नहीं। इसमें निम्न तत्त्व होंगेः

  1. राज्यों को कोई वित्तीय या सैन्य शक्तियां नहीं दी जाएं।
  2. समस्त अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय मामले केंद्र के दायरे में हों।
  3. सभी स्थानीय मामले, चुनावों सहित, राज्य की जिम्मेदारी हों।
  4. राज्य स्थानीय भाषाओं के अतिरिक्त राष्ट्रीय भाषा इस्तेमाल करें और सिखाएं।
  5. राज्य के प्रतीक राष्ट्र प्रतीकों से नीचे प्रदर्शित होें।
  6. राज्य राष्ट्रीय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लें।

‘भारतीय विशिष्टतावाद’ इतिहास की दिशा बदल सकता है। अगर हम भारत को एक सच्चा विशिष्ट राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो हमें एक व्यावहारिक और श्रेष्ठतर राजनीतिक पंथ विकसित करने का प्रयास करना होगा।

[लेखक ‘दिव्य हिमाचल’ समाचारपत्र के संस्थापक और ‘राष्ट्रपति प्रणाली: कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ पुस्तक के रचनाकार हैं ]

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 4 जुलाई 2018 के अंक में प्रकाशित।

Advertisements