विकास से भी बढ़कर यह बेहतर शासन देने का उनका वचन था जो उन्हें सत्ता में लाया। आज भी भाजपा ‘‘बेहतर शासन’’ को ‘‘मोदी मंत्र’’ कहकर प्रचार करती है। और यह सही भी है क्योंकि धरातल पर शासन में सुधार लाए बिना यदि देश का विकास होता भी है, तो यह बहुत धीमी गति से होगा और अधिक समय नहीं चल पाएगा।

जीएसटी, विमुद्रीकरण और एयर इंडिया की बिक्री साहसिक विकास के कदम तो हो सकते हैं, परंतु वे भारत में शासन के मूलभूत सुधार नहीं हैं। हमारी सरकार की प्रणाली में निम्न आवश्यक सुधार लाकर ही मोदी बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे…

भानु धमीजा

अगर प्रधानमंत्री मोदी इतिहास में एक महान सुधारक (रिफॉर्मर) के रूप में दर्ज होना चाहते हैं, तो उन्हें आर्थिकी या करों में ही नहीं, भारत के शासन में भी सुधार लाना होगा। विकास से भी बढ़कर यह बेहतर शासन देने का उनका वचन था जो उन्हें सत्ता में लाया। आज भी भाजपा ‘‘बेहतर शासन’’ को ‘‘मोदी मंत्र’’ कहकर प्रचार करती है। और यह सही भी है क्योंकि धरातल पर शासन में सुधार लाए बिना यदि देश का विकास होता भी है, तो यह बहुत धीमी गति से होगा और अधिक समय नहीं चल पाएगा।

जीएसटी, विमुद्रीकरण और एयर इंडिया की बिक्री साहसिक विकास के कदम तो हो सकते हैं, परंतु वे भारत में शासन के मूलभूत सुधार नहीं हैं। हमारी सरकार की प्रणाली में निम्न आवश्यक सुधार लाकर ही मोदी बेहतर प्रदर्शन कर पाएंगे।

स्थानीय शहरी सरकारें शक्तिशाली बनाएं

भारतीय नगर नियंत्रण से बाहर जा चुके हैं। उनमें जीवन की गुणवत्ता शोचनीय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शहरों की स्थानीय सरकारों के पास न शक्तियां हैं और न ही उत्तरदायित्व। शहरों के मेयर और काउंसिल को शक्तियां न सौंपकर राज्य  सरकारों ने 74वें संविधान संशोधन के प्रयासों को निरस्त कर दिया है। म्यूनिसिपल निकायों को सीधे शक्तियां हस्तांतरित कर, उनके संविधानों का पुनर्गठन कर, उन्हें आत्मनिर्भर बना, और मेयर का प्रत्यक्ष निर्वाचन करवाकर इस स्थिति को सुधारा जा सकता है।

इस संबंध में कांग्रेस सांसद डा. शशि थरूर द्वारा एक प्राइवेट मेंबर बिल लोकसभा में पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका है। मैं मोदी सरकार से वह विधेयक पास करने का आग्रह करता हूं। यह स्थानीय स्तरों पर नेतृत्व का झगड़ा घटाता है, विकेंद्रीकरण में सुधार लाता है, और जवाबदेही बढ़ाता है।

एक प्राइवेट मेंबर बिल का पारित होना अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण और आसान सुधार होगा। वर्ष 1970 से संसद में विपक्ष का कोई भी विधेयक पास नहीं हुआ है। इससे संसद का गौरव पुनः स्थापित होगा और पार्टीबाजी में कमी आएगी।

न्यायपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह बनाएं

हमारी न्यायालय प्रणाली में घोर विलंबों और भ्रष्टाचार के कारण भारतीयों को अकसर न्याय नहीं मिल पाता। इसके दो मूल कारण हैंः अति केंद्रीकरण, और न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता का अभाव। दोनों का उपचार हो सकता है यदि हम न्यायालयों को जवाबदेह ठहराने में सरकारों के बजाय जनप्रतिनिधियों को शामिल करें।

मोदी एक ऐसी प्रणाली लागू कर सकते हैं जिसके तहत न्यायपालिकाएं केंद्र व राज्य दोनों स्तरों पर न्यायालयों में सुधार प्रस्तावित करें, और अपने कालेजियम के जरिए न्यायाधीशों का नामांकन करना जारी रखें। पर उनकी सिफारिशें को संबंधित विधायिकाओं, राज्यसभा या विधान परिषद या सभा, द्वारा अनुमोदित किया जाए। यह अमरीकी न्यायपालिका में वहां की सीनेट की भूमिका के समान होगा।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग (एनजेएसी) के जरिए न्यायपालिका के निरीक्षण का सरकार का प्रयास असफल रहा क्योंकि इसने दो कार्यकारी शक्तियों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया। शासन में प्रभावी नियंत्रणों के लिए सरकारी नहीं, विधायी निरीक्षण की आवश्यकता होती है। इसके अतिरिक्त, सरकारी प्रतिनिधियों का आयोग एक अपारदर्शी प्रणाली को बदलकर दूसरी खड़ी कर देता है। जैसा कि विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के एक विद्वान, आलोक प्रसन्न कुमार ने लिखा है, ‘‘एनजेएसी कॉलेजियम व्यवस्था की तमाम खामियों से भरपूर मात्र एक दिखावे का परिवर्तन है।’’

संसदीय निरीक्षण बहाल करें

भारत की विधायिकाएं निर्रथक हो गई हैं। सरकारें जो चाहे वह कानून पास करवा सकती हैं, जबकि विपक्ष केवल कार्यवाही में व्यवधान डाल सकता है या वाकआउट कर सकता है। इस कारण कम गुणवत्ता के कानून बन रहे हैं और भ्रष्टाचार हो रहा है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च नामक एक प्रबुद्ध मंडल द्वारा बहुत से इलाज सुझाए गए हैं : संसद को स्वयं सत्र बुलाने की अनमुति देना; एजेंडा तय करने के लिए विपक्ष को कुछ सशक्त करना; समिति प्रणाली को सुदृढ़ करना, जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय करना, आदि।

परंतु यदि मोदी मात्र तीन काम ही कर दें, तो सरकार के निरीक्षण का संसद का मूलभूत कार्य काफी हद तक बहाल हो जाएगा। पहला, सभी संसदीय समितियों द्वारा की जाने वाली जनसुनवाई टीवी पर प्रसारित करना आवश्यक हो। दूसरा, दलबदल विरोधी कानून निरस्त किए जाएं जो सांसदों और विधायकों को, अविश्वास प्रस्ताव को छोड़कर, विधेयकों पर उनकी पार्टी की इच्छाओं के खिलाफ वोट देने से रोकते हैं। संवैधानिक विशेषज्ञ माधव खोसला ने कहा है कि ‘‘यह बाधा विधायिका को इसके मूलभूत कार्य, कार्यपालिका की निगरानी, करने से रोकती है।’’ और तीसरा, सरकार द्वारा प्रमुख पदों, जैसे सीबीआई और चुनाव आयोग प्रमुखों के लिए नामित व्यक्तियों के अनुमोदन की शक्ति विधायिका को दी जाए।

राष्ट्रपति की शक्तियां बहाल हों

भारत में एक बार सत्ता प्राप्त करने के बाद बहुमत मनमानी करने लगते हैं, क्योंकि उनके कार्यों पर कोई नियंत्रण नहीं है। राष्ट्रपति का पद उन्हें नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था। परंतु गणतंत्र के आरंभ से ही अधिक शक्तिशाली प्रधानमंत्री के पद ने इसे क्षीण करना आरंभ कर दिया। एक उत्कृष्ट राष्ट्रपति नियुक्त करने की संविधान सभा की सोच के विपरीत एमरजेंसी के दौरान 42वें संशोधन द्वारा यह पद महज रबड़ स्टैंप बना दिया गया। आज राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह के अनुरूप कार्य करने को विवश हैं।

राष्ट्रपति को कुछ ऐच्छिक शक्तियां देकर मोदी को इंदिरा गांधी द्वारा उस पद पर गलत रूप से पहनाई गई बेडि़यों को तोड़ देना चाहिए। अब राष्ट्रपति की शक्तियों की व्याख्या करने वाले उस ‘अनुदेश पत्र’ का समय आ गया है जिसे बीआर अंबेडकर ने एक बार संविधान में जोड़ने का वचन दिया था, परंतु बाद में बिना कारण बताए मुकर गए थे।

राज्यों पर राष्ट्रपति शासन व्यवस्था समाप्त करें

भारतवासियों को जमीन पर खराब शासन झेलना पड़ता है क्योंकि राज्य सरकारें असल में जवाबदेह नहीं हैं। उनकी जिम्मेदारियां केंद्र के साथ परस्पर स्पष्ट नहीं हैं, और वे केंद्र की उदारता पर बहुत अधिक निर्भर होती हैं। परंतु राज्य सरकारों की जनता के प्रति जवाबदेही को सबसे अधिक नुकसान राष्ट्रपति शासन के जरिए केंद्र द्वारा उन्हें मनमाने ढंग से भंग करना पहुंचाता है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय (बोम्मई 1994)-कि एक राज्य सरकार की वैधता विधानसभा में ही जांची जानी चाहिए केंद्र द्वारा नहीं-के दो दशक बाद भी प्रथा जारी है। अरुणाचल में वर्ष 2016 में मनमानी पूर्वक राष्ट्रपति शासन थोपने पर न्यायालय ने कहा कि मोदी सरकार ने राज्य की ‘‘निर्वाचित सरकार को अपमानित’’ किया है।

समय आ गया है कि राज्यों पर राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था समाप्त कर दी जाए। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने लिखा है, ‘‘अगर केंद्रीय शासन राष्ट्रपति शासन के बिना चल सकता है, तो राज्य भी ऐसा कर सकते हैं।’’

चुनाव सुधारों को लागू करें

हम भारतीय अच्छे नेता निर्वाचित नहीं कर रहे हैं। इसका बहुत बड़ा कारण उम्मीदवारों के चयन और उनके फंड के स्रोतों में पारदर्शिता का अभाव है। मूलभूत सुधारों के इस क्षेत्र में मोदी गलत दिशा में बढ़ते प्रतीत होते हैं। निवर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने राजनीति फंड कानूनों में ताजा बदलावों को ‘‘एक प्रतिगामी कदम’’ बताया है, जिसने ‘‘पारदर्शिता को सुधारने के बजाय बिगाड़ दिया है।’’ उन्होंने मोदी सरकार की जोरदार आलोचना की है।

चुनाव आयोग स्वयं दो दशक से भी अधिक समय से कई चुनाव सुधार सुझा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तीन वर्ष से भी पहले सरकार को निर्देश दिया था कि वह पर्ची वाली डब्ल्यूपीएटी वोटिंग मशीनों के लिए धन उपलब्ध करवाए।

परंतु यदि मोदी भारत के राजनीतिक दलों पर मात्र तीन शर्तें -1) आंतरिक लोकतंत्र कायम करें; 2) प्राथमिक चुनाव के जरिए उम्मीदवार चुनें; और 3) ऑडिटिड वित्तीय खाते जारी हों – लागू करें तो वह हमारी निर्वाचक राजनीति को सचमुच सुधार देंगे। अपनी पार्टी पर उनके प्रभाव के दृष्टिगत मोदी इन परिपाटियों की शुरुआत अगर पहले भाजपा से ही करें तो अच्छा रहेगा।

 

सच्चे सुधारों के लिए हौसला चाहिए। निश्चय ही मोदी में बहादुरी की कोई कमी नहीं लगती। और शायद इसी में भारत की श्रेष्ठतम उम्मीद निहित है।

 

[लेखक चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं]

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 26 जुलाई 2017 के अंक में प्रकाशित।

 

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