सरकार में बैठे लोग अपनी शक्तियों में कमी क्यों चाहेंगे ?…

पी. के. खुराना

आदमी उम्र से नहीं, विचारों से बूढ़ा होता है। जब हम नए विचार ग्रहण करना बंद कर देते हैं तो हम बूढ़े हो जाते हैं। देश के समग्र विकास के लिए यह आवश्यक है कि हम अन्य व्यक्तियों के दृष्टिकोण के प्रति दिमाग खुला रखें और उनसे लाभ लेने के लिए आवश्यक माहौल तैयार करें।

युवा शक्ति की प्रशंसा इसीलिए की जाती है कि उनमें ऊर्जा तो बहुत होती है, पर पूर्वाग्रह नहीं होता और वे दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति खुले दिमाग से सोचते हैं। अगर देश के सभी नागरिक हर मामले में युवा वर्ग के इसी दृष्टिकोण का अनुसरण करें, तो हमारा देश ‘यंगिस्तान’ बन जाएगा।

‘यंगिस्तान’ का मतलब है खुला दिमाग, दूसरों के नजरिए के प्रति सहनशीलता, नई बातें सीखने का जज्बा, काम से जी न चुराना, तकनीक का लाभ उठाने की योग्यता, प्रगति और रोजगार के नए और ज्यादा अवसर, आपसी भाईचारा तथा देश और क्षेत्र का समग्र विकास!

भारतीय संविधान की मूल भावना को ‘जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार’ के रूप में व्यक्त किया गया है। दूसरे शब्दों में इसे ‘जनता की सहभागिता के द्वारा शासन’ कहा जा सकता है, यानी हमारे संविधान निर्माता हर स्तर पर आम आदमी, सरकार और प्रशासन में उसकी भागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे। इसी के जरिए लोगों में रचनात्मकता, नवाचार और पहल की भावनाओं का विकास होता है। किसी भी राष्ट्र के संपूर्ण विकास में ऐसी भावनाएं अपेक्षित रहती हैं।

भारतीय प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रणाली की संरचना इस प्रकार की गई थी कि यह एक लोक कल्याणकारी राज्य बने, जिसमें हर धर्म, वर्ग, जाति, लिंग और समाज के व्यक्ति को देश के विकास में भागीदारी के बराबर के अवसर मिलें।

लोकतंत्र की सफलता की मूल शर्त यह है कि ‘तंत्र’, ‘लोक’ पर हावी न हो। लोकतंत्र का दूसरा अहम पहलू यह है कि शासन में जनता की सशक्त और सार्थक भागीदारी हो, महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने में और कानून बनाने में जनता की राय की अहमियत हो।

सरकार के तीन अंग

हमारे देश में संसदीय प्रणाली लागू है जो मुख्यत: ब्रिटिश संविधान से प्रेरित है। हमारी सरकार विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका नामक तीन अंगों में बंटी हुई है। जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों का समूह विधायिका है जिसका मुख्य कार्य पुराने कानूनों की समीक्षा करना, आवश्यकतानुसार उनमें संशोधन करना, उन्हें निरस्त करना और नये कानून बनाना है। सरकार का दूसरा अंग, कार्यपालिका, कानून को लागू करने और संविधानसम्मत कानूनों के अनुसार शासन चलाने वाला अंग है। बहुमत प्राप्त दल अथवा गठबंधन का नेता केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्य में मुख्यमंत्री होता है, जो अपने दल अथवा गठबंधन में से अपने मनपसंद के सदस्यों को मंत्रिपरिषद् के लिए नामित करता है। सरकार का तीसरा अंग न्यायपालिका है जो संविधान और कानूनों की व्याख्या करती है और संविधान के मूल स्वरूप को अक्षुण्ण बनाए रखने का काम करती है तथा दो या अधिक पक्षों में विवाद की स्थिति में न्याय देती है।

सरकार की इस प्रणाली को संसदीय प्रणाली इस लिए कहा गया क्योंकि यह माना गया कि इस प्रणाली में संसद सर्वोच्च है क्योंकि वह कानून बनाती है, न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है और कार्यपालिका उन कानूनों के अनुसार शासन चलाती है।

संसद की सर्वोच्चता का दूसरा अर्थ यह है कि मंत्रिगण अपने हर कार्य के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी हैं और यदि प्रधानमंत्री या उनकी मंत्रिपरिषद् का कोई सदस्य ऐसा करने में विफल रहे तो संसद उन्हें हटा दे। परिकल्पना के रूप में यह एक उत्तम विचार है लेकिन व्यावहारिक स्थिति का विश्लेषण किये बिना किसी निर्णय पर पहुंचना तर्कसंगत नहीं है।

शक्तियों का बंटवारा और उनका संतुलन

इतिहास ने सिद्ध किया है कि जब शक्तियां निरंकुश हो जाती हैं तो सरकारें अत्याचारी हो जाती हैं और जब शक्तियां बहुत अधिक दबाई जाती हैं तो सरकारें प्रभावहीन होने लगती हैं। इसलिए एक आदर्श शासन व्यवस्था में सरकार के हर अंग के कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या एकदम स्पष्ट होती है, उनमें आपसी संतुलन होता है, उनका गठन एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से होता है और उनके पास सरकार के दो अलग अंगों की शक्तियां एक साथ नहीं होतीं, हर अंग अपनी ही शक्तियों का इस्तेमाल करता है, लेकिन वे कुछ हद तक एक दूसरे को नियंत्रित कर सकती हैं ताकि सरकार के निरंकुश होकर अत्याचारी होने की आशंका न हो।

संसदीय व्यवस्था का सच

भारतवर्ष में संसदीय व्यवस्था लागू है। यह समझना आवश्यक है कि संसदीय व्यवस्था के बारे में हम क्या जानते हैं और व्यवहार में यह कैसे काम करती है। संसदीय व्यवस्था में शासन के तीन अंग कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका हैं। विधायिका का चुनाव सीधे मतदान से होता है और यह पुराने कानूनों की समीक्षा कर सकती है, उनमें संशोधन कर सकती है तथा नये कानून बना सकती है। सदन में बहुमत प्राप्त दल अथवा गठबंधन का नेता प्रधानमंत्री बनता है तथा वह सदन के सदस्यों में से अपने सहयोगी चुनता है। सरकार का यह अंग कार्यपालिका है जिसे संसद द्वारा पारित कानूनों को लागू करने व उन कानूनों के अनुसार शासन चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। तीसरा अंग न्यायपालिका है जो संसद द्वारा बनाए गए कानूनों की व्याख्या करती है।

दिखने में तीनों अंग स्वतंत्र हैं लेकिन व्यवहार में बड़ा फर्क है क्योंकि कार्यपालिका में शामिल लोगों का संसद के किसी सदन, यानी विधायिका का सदस्य होना आवश्यक है। इसका परिणाम यह है कि कार्यपालिका कानून बनाती भी है, उन्हें लागू भी करती है और शासन भी चलाती है।

कार्यपालिका, यानी सरकार, के पास सिर्फ कानून बनाने और शासन करने की दोहरी शक्तियां ही नहीं हैं, बल्कि व्यवहार में ये शक्तियां लगभग असीमित हैं। बहुमत होने के कारण सरकार द्वारा संसद में पेश किया गया हर बिल कानून बन जाता है, दलबदल कानून के कारण सत्तापक्ष के सदस्य सरकारी बिलों के पक्ष में मत देने के लिए विवश हैं इसलिए विपक्ष का विरोध धरा रह जाता है और सरकार की मनमानी चलती है। संसद में विपक्ष का लाया कोई बिल पास नहीं होता अत: संसद के आधे सदस्य तो विधायिका में होते हुए भी अप्रासंगिक हो जाते हैं। यही नहीं, यदि कोई सरकारी बिल गिर जाए तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ेगा, ऐसे में विपक्षी दल शोर चाहे जितना मचाएं, व्यवहार में वे वाकआउट करके सरकार को गिरने से बचाते रहते हैं ताकि जब तक संभव हो दोबारा चुनाव की जहमत से बच सकें। चूंकि प्रधानमंत्री सदन का कार्यकाल समाप्त होने से पहले भी सदन को भंग करवा सकते हैं अत: सदन सरकार के नियंत्रण में रहता है। एक मजबूत प्रधानमंत्री कैबिनेट की सहमति के बिना भी शासन चला सकता है, अध्यादेशों के सहारे शासन चला सकता है और संसद को बाईपास कर सकता है। इससे सरकार निरंकुश हो जाती है जिसने न्यायपालिका को एक्टिविस्ट बनने पर विवश किया।

अब इस सच का विश्लेषण करें तो स्पष्ट हो जाता है कि संसद सर्वोच्च नहीं है, सरकार ही कार्यपालिका भी है और विधायिका भी, तथा न्यायपालिका को कार्यपालिका या विधायिका के काम करने के लिए एक्टिविस्ट बनने पर विवश होना पड़ रहा है। शक्तियों के इस गड्डमड्ड से हमारी शासन व्यवस्था जड़ तक दूषित हो गई है।

यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि इंदिरा गांधी ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए देश पर आपातकाल थोप दिया था, संसद का कार्यकाल 6 वर्ष का कर दिया था और संसद में कोरम की शर्त खत्म करके यह कानून बनवा लिया था कि संसद में यदि केवल कुल एक सदस्य ही उपस्थित हो और वह सरकारी बिल के पक्ष में मत दे दे तो बिल को पास मान लिया जाएगा।

वर्तमान प्रधानमंत्री ने कैबिनेट की सहमति के बिना नोटबंदी का ऐलान कर दिया। इसी से समझा जा सकता है कि संसदीय व्यवस्था वस्तुत: एकतंत्र है और संसद की सर्वोच्चता बेमानी है।

इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री बने और 1985 के चुनावों में उन्हें भी इतना जन समर्थन मिला कि विपक्ष भौचक रह गया। कांग्रेस के लोग दलबदल न कर सकें और उनका बहुमत बचा रहे, इस उद्देश्य से उन्होंने दलबदल विरोधी कानून पास करवाकर राजनीतिक दलों के अध्यक्ष को लगभग असीमित अधिकार दे दिए, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के क्षरण का अगला बड़ा कारण बना।

बहुमत के बल पर प्रधानमंत्री की तानाशाही हमारे संविधान की खामियों का दूसरा बड़ा उदाहरण है। बाद में बोफोर्स तोप की खरीद में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते राजीव गांधी अगला चुनाव हार गए और हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवी लाल की सहायता से विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने और उन्होंने बड़बोले देवी लाल को उप प्रधानमंत्री बनाया। कभी उनके सबसे बड़े समर्थक रहे देवी लाल ही उनके सर्वाधिक मुखर विरोधी बने और देवी लाल से मतभेदों के कारण अपनी गद्दी हिलती देखकर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल का पिटारा खोलकर देश को आरक्षण का ऐसा नासूर दे डाला कि आज तक उसका इलाज संभव नहीं हो पाया है। प्रधानमंत्री कमजोर हो जाए तो अपने स्वार्थ के लिए वह देश का कितना बड़ा नुकसान कर सकता है, इसका यह स्पष्ट उदाहरण है।

वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा को ऐतिहासिक जीत दिलवाकर लंबे समय के बाद एक ही दल के बहुमत की सरकार बनाई है, वरना यह मान लिया गया था कि केंद्र में गठबंधन सरकारों का कोई विकल्प नहीं है। मोदी के इस चमत्कार का परिणाम यह हुआ है कि उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी उनके इशारों पर नाचने के लिए विवश हैं और भाजपा भी उनकी छाया बनकर रह गई है। वह अध्यादेशों के माध्यम से सरकार चला रहे हैं और उन्होंने संसद को अप्रासंगिक बना दिया है।

मोदी जो काम कर रहे हैं, उन पर न तो जनता में संवाद है और न ही संसद में चर्चा। इस प्रकार नरेंद्र मोदी ने खुद को ज्यादा से ज्यादा अधिकार दे दिए हैं। सीबीआई का मुखिया चुनने में उन्होंने विपक्ष की भूमिका सीमित कर दी। योजना आयोग को समाप्त करके मात्र एक थिंक टैंक बना दिया। बीमा उद्योग में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ा दी।

कहने का अर्थ यह है कि संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री यदि बहुमत की सरकार का मुखिया हो, तो वह सारी शक्तियां हड़प सकता है। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरेंद्र मोदी ने इसे साबित कर दिखाया।

इसी प्रकार यदि प्रधानमंत्री कमजोर हो तो अपनी कुर्सी की खातिर देश को बांट सकता है, जैसा कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कर डाला था।

आज हम नरेंद्र मोदी से अपेक्षा कर रहे हैं कि वह अच्छे काम करेंगे, अच्छे कानून बनाएंगे और देश की समस्याएं हल करेंगे। पिछली सरकार के नकारेपन से परेशान भारतीय नागरिक नरेंद्र मोदी से आवश्यकता से अधिक आशाएं लगाए बैठे हैं और खुद को अधिकार संपन्न करने के उनके हर कदम का स्वागत कर रहे हैं, बिना यह सोचे कि भविष्य में कोई प्रधानमंत्री इन अधिकारों का कितना दुरुपयोग कर सकता है।

शक्तिहीन राज्य सरकारें

देश का आम नागरिक राज्य सरकारों के संपर्क में होता है, केंद्र के नहीं, और राज्य सरकारों की हालत इतनी खस्ता है कि पंजाब में पिछली बादल सरकार को अपना कामकाज चलाने के लिए कर्ज लेना था जिसके लिए उसे जेलों और विधवाघरों को गिरवी रखना पड़ा, वह भी तब जब वह केंद्र सरकार में शामिल थी। जब सत्तारूढ़ दल की सहयोगी राज्य भी सरकारें इतनी विवश हैं, तो वे नागरिकों का भला क्या करेंगी?

संसदीय प्रणाली की ही एक और बड़ी खामी हाल ही में बिहार में फिर से उभर कर सामने आई है।

प्रधानमंत्री केवल उन्हीं लोगों को मंत्रिमंडल में शामिल कर सकते हैं, जो या तो सांसद हों या फिर मंत्री बनने के छह माह के भीतर सांसद हो जाएं। इसी तरह मुख्यमंत्री भी उन्हीं लोगों को अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर सकता है जो या तो विधायक हों या फिर छह महीने के भीतर विधायक बन जाएं। चूंकि ताजा विधानसभा चुनावों में लालू यादव के दल ने नीतीश के जदयू से भी ज्यादा सीटें हासिल की हैं और लालू यादव के दल के बल पर ही वह बहुमत में हैं। उनके लिए लालू यादव के लगभग अनपढ़ बच्चों को मंत्रिमंडल में लेना अनिवार्य हो गया और जिस तरह नरेंद्र मोदी ने एक गैर-स्नातक महिला को शिक्षा मंत्री बना डाला था, वैसे ही नीतीश कुमार ने लगभग अनपढ़ माने जा सकने वाले एक अनुभवहीन युवक को बिहार का उप मुख्यमंत्री बना डाला है।

गोवा में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाने से खरीद-फरोख्त और सौदेबाजी के माध्यम से गठबंधन सरकार बनी है। लोकतंत्र का इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है?

विकल्प क्या है ?

अमरीका में लागू राष्ट्रपति प्रणाली में संसद का चुनाव सीधे होता है और वह कानून बनाती है। उसका कोई सदस्य सरकार में शामिल नहीं होता और कानून लागू करने या शासन चलाने में उसकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है। कार्यपालिका के लिए राष्ट्रपति का चुनाव होता है, उसका कार्यकाल निश्चित है, वह अपने सहयोगी चुनता है जिनका राजनीति में होना या न होना आवश्यक नहीं है, अत: वे विशेषज्ञ भी हो सकते हैं। वह संसद द्वारा पारित कानूनों के अनुसार शासन चलाता है। सरकार के ये दोनों अंग एक दूसरे के सामान्य कामकाज में दखल दिये बिना एक-दूसरे को नियंत्रित भी करते हैं। राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत विदेशी संधियों के लागू होने के लिए कांग्रेस का समर्थन आवश्यक है, इसी तरह राष्ट्रपति अपने सहयोगी चुनने के लिए स्वतंत्र है परंतु उन पर कांग्रेस की सहमति अनिवार्य है। दूसरी ओर, राष्ट्रपति कानून नहीं बनाता लेकिन वह संसद द्वारा पारित कानून को वीटो कर सकता है। न्यायपालिका का कार्य पूर्णत: स्वतंत्र है। वह संसद द्वारा पारित किसी कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है। इस प्रकार सरकार के सभी अंग स्वतंत्र हैं और एक-दूसरे को सीमित ढंग से नियंत्रित भी करते हैं। अमरीकी संसद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कोई भी बिल 60 प्रतिशत सदस्यों के समर्थन के बिना पास नहीं हो सकता। परिणामस्वरूप किसी भी बिल को पास करवाने के लिए अक्सर विपक्ष का सहयोग लेना ही पड़ता है, जिससे बिलों पर खूब चर्चा होती है, स्वतंत्र चर्चा होती है और गहन चर्चा से गुजरने के कारण बढ़िया स्तर के जनहितकारी प्रावधान ही कानून बन पाते हैं।

संसदीय व्यवस्था में जहां 70 साल से भी कम समय में कई प्रधानमंत्री तानाशाही रवैया अपना चुके हैं वहीं अमरीका के 200 साल के इतिहास में एक भी राष्ट्रपति तानाशाह नहीं बन सका।

शुरुआत कैसे हो ?

आपातकाल के समय एक बार इंदिरा गांधी ने देश में राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की बात सोची जरूर थी, लेकिन फिर उन्होंने महसूस किया कि राष्ट्रपति प्रणाली में राष्ट्रपति के पास उतने अधिकार नहीं होते जितने संसदीय प्रणाली में एक निरंकुश प्रधानमंत्री के पास हो सकते हैं, अत: उन्होंने इस विचार को आगे नहीं बढ़ाया। लाल कृष्ण आडवाणी भी राष्ट्रपति प्रणाली का समर्थन करते रहे हैं। तिरुअनंतपुरम से लोकसभा में सांसद शशि थरूर सदैव से राष्ट्रपति शासन प्रणाली के हामी रहे हैं। सन् 2011 से ही वे यह कहते आ रहे हैं कि भारत जैसे विशाल देश के लिए जहां क्षेत्र, धर्म, संप्रदाय, भाषा आदि की बहुत सी विविधताएं हैं और जहां दो या तीन नहीं बल्कि दो हजार से भी ज्यादा राजनीतिक दल हैं, वहां संसदीय प्रणाली कभी भी आदर्श व्यवस्था नहीं हो सकती। इसके दो साल बाद भाजपा के राज्यसभा सदस्य राजीव प्रताप रूडी, जो अब केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं, ने एक निजी बिल के माध्यम से देश में राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की वकालत की।

शशि थरूर ने तो इससे भी आगे बढ़कर लोकसभा के मानसून सत्र में स्थानीय निकायों में मेयर के सीधे चुनाव का बिल भी लोकसभा में पेश कर दिया था ताकि राष्ट्रपति प्रणाली के गुणों को स्थानीय स्तर पर लागू करके धीरे-धीरे उसे राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जा सके और लोगों की इस धारणा को निर्मूल सिद्ध किया जा सके कि राष्ट्रपति प्रणाली अच्छी शासन व्यवस्था नहीं है या कि इस प्रणाली से चुना गया राष्ट्रपति तानाशाह हो जाता है।

शशि थरूर का यह निजी बिल हमारी नगरपालिकाओं और नगर निगमों को अधिक अधिकार देकर समर्थ बनाने का एक सुलझा प्रयास था। यह उन्हें स्वायत्तता देने, खुद मुख्तार बनाने, राज्यों द्वारा उन्हें आवश्यक शक्तियां प्रदान करने तथा उनकी संरचना बदलने का बिल था। इसमें नगरपालिकाओं एवं नगर निगमों के मुखिया के सीधे चुनाव का प्रावधान था। इस बिल के उद्देश्य में कहा गया था कि सीधे चुना गया महापौर (मेयर) राजनीतिक, व्यावहारिक तथा आर्थिक रूप से स्वतंत्र होगा और इससे अपने शहर के मामलों में उनकी जिम्मेदारी और जवाबदेही दोनों स्थापित हो सकेंगी।

फिलहाल स्थानीय स्तर पर नेतृत्व की शक्तियां और जिम्मेदारियां पार्षदों, विधायकों तथा सांसदों और अधिकारियों के बीच उलझनपूर्ण ढंग से बिखरी हुई हैं। इस बिल का लक्ष्य उस बिखराव को समेटना, उलझनें दूर करना, शक्तियों का विकेंद्रीकरण और जवाबदेही बनाना है।

यदि हम चाहते हैं कि हमारे शहरों में जवाबदेह और जिम्मेदार सुशासन हो तो इस बिल के लक्ष्य उसे पूरा करते हैं। हमारे शहरों में शक्तियों का बिखराव एक गंभीर समस्या है। शहरी स्वशासन के मामले में मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, उपायुक्त, निगम आयुक्त, पार्षद और महापौर आदि की जिम्मेदारियां एक समान हैं जिससे बहुत उलझन होती है क्योंकि किसी एक व्यक्ति की जवाबदेही नहीं बन पाती।

इसी प्रकार शक्तियों का विकेंद्रीकरण एक अनिवार्य आवश्यकता है। राज्य के किसी कोने में कहीं दूर बैठे किसी व्यक्ति तक पहुंच बनाना या उससे स्थानीय समस्याओं के सटीक समाधान की आशा करना शायद संभव नहीं है।

हमारे शहर प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, गंदे-सड़े पानी से भरी गलियों और घटिया जीवन की घृणास्पद तस्वीर पेश करते हैं। इन सबसे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि हम स्थानीय स्वशासन को मजबूत और जवाबदेह बनाएं। शशि थरूर के बिल में प्रावधान था कि मेयर का सीधा निर्वाचन होगा, वे एक निश्चित समयावधि के लिए चुने जाएंगे, नगर निगम के प्रस्तावों के मतदान में भाग नहीं लेंगे पर आवश्यकता होने पर नगर निगम के प्रस्तावों को वीटो कर सकेंगे।

संसद में निजी बिल पास होना लगभग असंभव हो गया है। सन् 1970 के बाद एक भी निजी बिल पास नहीं हो पाया है। सरकार में बैठे लोग अपनी शक्तियों में कमी क्यों चाहेंगे, इसलिए शशि थरूर के बिल के पास होने की संभावना थी ही नहीं क्योंकि यदि यह बिल पास होकर कानून बन जाता तो स्थानीय स्तर पर बहुत से नये और स्वतंत्र नेताओं के उभरने की राह बनती, लेकिन हम जानते हैं कि सांसद अथवा विधायक किसी अन्य स्वतंत्र व्यक्ति को शक्तिसंपन्न होते हुए देखना नहीं चाहेंगे और न ही राज्य सरकारें अपनी शक्तियां स्थानीय निकायों को देना चाहेंगी।

लेकिन यह एक अच्छी शुरुआत है और अब यह जनता पर मीडिया, बुद्धिजीवियों और आम जनता पर मयस्सर है कि वे खुले दिमाग से सोचें, ‘मत’ के बजाय तथ्यों को अधिमान दें ताकि हम नकारा संसदीय प्रणाली को अलविदा करने की दिशा में पहला कदम उठा सकें।

 

[पी. के. खुराना दो दशक तक इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण, पंजाब केसरी और दिव्य हिमाचल आदि विभिन्न मीडिया घरानों में वरिष्ठ पदों पर रहे। वे मीडिया उद्योग पर हिंदी की प्रतिष्ठित वेबसाइट ‘समाचार4मीडिया’ के प्रथम संपादक थे। सन् 1999 में उन्होंने अपनी जनसंपर्क कंपनी ‘क्विकरिलेशन्स प्राइवेट लिमिटेड’ की नींव रखी जो अब देश भर में देश भर में काम करती है।]

यह लेख पहले हस्तक्षेप.कॉम पर 07/05/2017 को प्रकाशित हुआ है ।

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