दिल्ली के एक अग्रणी समाचारपत्र, नवोदय टाइम्स में प्रकाशित भानु धमीजा का इंटरव्यू…

भानु धमीजा ‘दिव्य हिमाचल ग्रुप’ के संस्थापक और चेयरमैन हैं। उनकी किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्स द प्रैसीडेंशियल सिस्टम’ इन दिनों चर्चा में है। हार्पर काॅलिन्स ने इसे प्रकाशित किया है। उन्होने इस किताब में गहन शोध के आधार पर तथ्यात्मक तरीके से यह बताया है कि आज क्यों राष्ट्रपति शासन प्रणाली की जरूरत है। दिल्ली दफ्तर में ‘नवोदय टाइम्स/पंजाब केसरी’ के साथ बातचीत में भी उन्होने देश के मौजूदा सिस्टम में बदलाव की जरूरत बताई।

बदलाव की जरूरत

इस किताब (व्हाई इंडिया नीडस द प्रैंसीडेंशियल सिस्टम) में राष्ट्रपति शासन प्रणाली की वकालत के सवाल पर भानु धमीजा कहते है ‘आज जमीनी स्तर पर गवर्नेस का क्या हाल है, क्वालिटी ऑफ लाइफ क्या है, राजनीति का क्या स्तर हो गया है, हम सभी जानते हैं। उनका कहना है ‘दो दशक के दौरान अमरीका में मैंने पढ़ाई और फिर नौकरी की। परिवार भी पाला। फिर अमरीका और अपने देश का अंतर देखा। दोनों जगहों की क्वालिटी ऑफ लाइफ मेें बड़ा फर्क नजर आया। आखिर ऐसा क्यों है कि हम भारतीय विदेश जाकर सफल हो जाते हैं। मुख्य वजह है- सिस्टम हमें इसमें बदलाव की जरूरत है।’

Navodya Times photo

दूर करनी होगी गलतफहमी

उनका मानना है कि सबसे पहले आम जनमानस में राष्ट्रपति शासन प्रणाली को लेकर जो गलतफहमी है, उसे खत्म करने की जरूरत है। इमरजैंसी के दौरान राष्ट्रपति शासन की कड़वी यादों के सवाल पर वह कहते हैं, ‘दरअसल, वह राष्ट्रपति शासन था ही नहीं, वह सिर्फ नाम का था। जहां भी राष्ट्रपति शासन प्रणाली को आधे-अधूरे तरीके से लागू किया गया, वह सफल नहीं हो पाया।’ वह कहतें हैं, ‘मौजूदा सिस्टम में तानाशाही के खतरे ज्यादा हैं। दो तिहाई बहुमत होने पर यह संभव है। उस दौरान इंदिरा सरकार ने संविधान में जो दो संशोधन करवाए थे, वे आज भी हैं। अपने देश में कथित तौर पर संघीय ढांचा है। राज्य सरकारें आत्मनिर्भर नहीं हैं। वे धन के लिए केंद्र पर निर्भर हैं। राज्यपाल के जरिए उन्हें बर्खास्त किया जा सकता है। इतिहास भी बताता है कि इस सिस्टम में तानाशाही संभव है। वहीं 225 साल के अमरीकन सिस्टम में कभी भी तानाशाही का बर्ताव नही दिखा।’

नेहरू की वजह से सिस्टम

इस किताब में जिक्र है कि आजादी के दौरान महात्मा गांधी हों, डॉ. अंबेडकर हों या फिर सरदार पटेल हों, कोई भी मौजूदा संसदीय प्रणाली के पक्ष में नही थे, सिर्फ जवाहरलाल नेहरू की वजह से यह लागू हुआ।

इस बारे में धमीजा कहते हैं, ‘अमरीका भी कभी भारत की तरह अपनी लड़ाई लड़ रहा था। वहां भी भारत की तरह ब्रिटिश मॅाडल का शासन था, पर उसने इसे खारिज कर दिया और आज वह सुपरपावर है।’

कोई पॉलिटिकल एजैंडा नहीं

धमीजा यह भी साफ करते हैं कि इस किताब के बहाने उनका कोई पाॅलिटिकल एजैंडा नहीं है। न ही किसी की तरफ इशारा है। वह कहते हैं, ‘मेरा एजैंडा सिर्फ भारत है। मौजूदा सिस्टम के जरिए हम वह तरक्की नही कर सकते जिसका सपना हम देख रहें हैं। न ही हम शिखर को छू पाएंगे। धमीजा के मुताबिक देश की स्थिति आज ठीक नहीं है लेकिन इसमें देशवासियों का दोष नही है। आम भारतीय कर्मठ और ईमानदार हैं। हमें सिस्टम गलत मिल गया है।’

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