सच्चाई यह है कि हमारे देश का बंटवारा इसलिए हुआ क्योंकि ये नेता स्वतंत्र भारत के लिए ऐसा संविधान नहीं बना पाए जो हिंदुओं और मुस्लिमों दोनों के लिए निष्पक्ष होता…

 

[भानु धमीजा]

71 वर्ष बीतने के बाद भी देश के बंटवारे का रोष और पीड़ा हमें विचलित करते हैं। भारत में हम अधिकतर जिन्ना को दोष देकर तसल्ली कर लेते हैं। पाकिस्तान में इसी प्रकार दोष आसानी से गांधी, नेहरू और पटेल के मत्थे मढ़ दिया जाता है।

परंतु सच्चाई यह है कि हमारे देश का बंटवारा इसलिए हुआ क्योंकि ये नेता स्वतंत्र भारत के लिए ऐसा संविधान नहीं बना पाए जो हिंदुओं और मुस्लिमों दोनों के लिए निष्पक्ष होता। वे बहुमत के शासन के अलावा लोकतंत्र की कल्पना ही नहीं कर पाए। और इसका अर्थ था कि हिंदू, जो स्थायी बहुमत में थे, हमेशा शासक होंगे और मुस्लिम शासित। यह टकराव वर्ष 1947 में सुलझ नहीं पाया, और आज दिन तक दोनों समुदायों के बीच विद्वेष का यही मुख्य कारण है।

बहुमत-शासन की अव्यवहारिकता

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बहुमत-शासन और लोकतंत्र अधिकतर भारतीयों के लिए एक-दूसरे का पर्याय बन गए। उनकी परिकल्पना यह रही कि स्वतंत्र भारत ब्रिटिश संसदीय लोकतंत्र की तर्ज पर चलेगा, जो बहुमत-शासन की एक प्रणाली है। उस प्रणाली में बहुमत वाला दल सरकार चलाता है, जबकि अल्पमत पार्टियां विपक्ष के रूप में अपने समय की प्रतीक्षा करती हैं।

भारतीय यह समझने में असफल रहे कि ब्रिटेन में पार्टियां धार्मिक आधार पर विभक्त न होकर सामाजिक और आर्थिक विचारधाराओं के अनुरूप गठित थीं। वर्ष 1941 में, ब्रिटिश संवैधानिक विद्वान सर इवोर जेन्निंग्स ने इस महत्त्वपूर्ण अंतर के विषय में सावधान किया था। ‘‘हमारे यहां, बहुमत स्थायी नहीं है,’’ उन्होंने लिखा। ‘‘यह व्यक्तिगत और राष्ट्रहित के भिन्न विचारों पर आधारित है, विचार जो बदलाव के प्रति अति संवदेनशील हैं और समय-समय पर बदलते भी हैं। यह महत्त्वपूर्ण तथ्य भुलाया नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यह बहुमत की नीतियों की पूर्ति के लिए अल्पमत को शांतिपूर्वक और यहां तक कि प्रसन्नतापूर्वक सहयोग देने को प्रेरित करता है।… एक कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार मुझे एक दिन में कंजर्वेटिव बनने के लिए राजी कर सकती है, परंतु यह मेरी वंशावली, मेरी भाषा, मेरा कबीला या जाति, मेरा धर्म या मेरी आर्थिक अवस्था नहीं बदल सकती।’’

भारत में, बहुमत-शासन की अव्यवहारिकता वर्ष 1937 में ही जाहिर हो गई थी, जब भारतीयों को पहली बार स्वयं प्रांतीय सरकारें बनाने की अनुमति मिली थी। कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग, दोनों ने 1935 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के तहत चुनावों में प्रवेश किया। इस एक्ट ने प्रांतीय विधायिकाओं में धार्मिक आधार पर सीटें आरक्षित की थीं। कांग्रेस और लीग के बीच सहमति थी और वे कई मुस्लिम चुनाव क्षेत्रों में सीधी भिड़ंत से बचे। कांग्रेस ने नेहरू के नेतृत्व में विशाल बहुमत हासिल कर लिया। मुस्लिम लीग पंजाब या बंगाल तक में भी नहीं जीत पाई जहां मुसलमान बहुमत में थे। वर्ष 1935 के कानून के सांप्रदायिक निर्णय के अंतर्गत 492 ‘‘मुस्लिम’’ सीटों में से लीग ने केवल 109 जीतीं।

संसदीय परंपरा का पालन करते हुए, कांग्रेस ने उन प्रांतों जहां वह सबसे बड़ी पार्टी थी, में पूरी तरह अपने बूते पर सरकारें बनाने का निर्णय लिया। अन्य प्रांतों में बहुमत वाली पार्टियों ने भी ऐसा ही किया। परिणामस्वरूप, लीग के विजयी उम्मीदवारों से किसी सरकार में शामिल होने को नहीं कहा गया। लीग के लिए इससे भी बुरा यह हुआ कि कांग्रेस ने मुस्लिमों को लुभाने का बड़ा अभियान आरंभ कर दिया। नेहरू ने स्पष्ट घोषणा की, ‘‘यह अब हम पर है कि… इस देश को हर प्रकार की सांप्रदायिकता से मुक्त करवाया जाए।’’ मुस्लिम नेता गठबंधन सरकारें बनाने से कांगे्रस के इनकार को विश्वासघात बताने लगे। लीग ने अपने मूल मतदाता वर्ग को बनाए रखने के लिए ‘इस्लाम खतरे में है’ का नारा देकर प्रचार अभियान शुरू कर दिया। जिन्ना ने बढ़ती हिंदू-मुस्लिम शत्रुता को लेकर गांधी से कुछ करने की सार्वजनिक प्रार्थना की, परंतु गांधी शक्तिहीन दिखे।

संसदीय प्रणाली की वर्ष 1937 की इस असफलता के कारण ही पाकिस्तान का जन्म हुआ। इस प्रणाली की केवल बहुमत सरकारों की धारणा ने लीग के संघर्ष को अर्थहीन बना दिया। क्योंकि भारत में मुस्लिम अल्पमत की स्थिति बदलने वाली नहीं थी, इसलिए लीग हमेशा विपक्ष में बैठने को अभिशापित थी। पाकिस्तान, जो अब तक महज एक विद्यार्थी के शोध में सुझाव था, अकस्मात मुस्लिमों को संगठित करने का कारण बन गया। बीएस राव, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के साहित्यकार और संविधान सभा के सदस्य ने लिखा, ‘‘वर्ष 1937 में पाकिस्तान की स्थापना के लिए बहुत कम समर्थन था… पर तीन सालों में ही राजनीतिक परिदृश्य में पूर्ण बदलाव आ चुका था।’’

पाकिस्तान का ऐलान करने से पूर्व हालांकि जिन्ना ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि असली मुद्दा संसदीय प्रणाली का बहुमत-शासन था। उन्होंने लीग से वर्ष 1939 में इस घोषणा का प्रस्ताव पास करवाया कि यह ‘‘लोकतंत्र और सरकार की संसदीय प्रणाली के वेश में एक बहुसंख्यक समुदाय के शासन के… पूरी तरह खिलाफ हैं।’’ वर्ष 1940 में लीग ने पाकिस्तान रेजोल्यूशन पास कर दिया।

शक्तियां साझा करने की निष्पक्ष प्रणाली की कमी

अगले सात साल भारतीय और अंगे्रज ऐसा हल तलाशने में लगे रहे जो कुछ शक्तियां साझा कर जिन्ना को संतुष्ट कर सके। परंतु क्योंकि सभी प्रस्तावों ने बहुमत नियंत्रण के तहत एक संसदीय प्रकार की केंद्रीय सरकार की कल्पना की, इस संबंध में कोई प्रगति नहीं हो पाई। उल्लेखनीय रूप से, यहां तक कि 1940 में लीग के अपने प्रस्ताव ने भी केवल प्रांतीय संप्रभुता और अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा की ही बात रखी। इसे एक पृथक पाकिस्तान बनाने के ध्येय को आगे बढ़ाने की चाल के तौर पर देखा गया। इसी प्रकार वर्ष 1942 में कांगे्रस का भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव खारिज कर दिया गया क्योंकि इसने भी केवल ‘‘संघीय इकाइयों को स्वायत्तता’’ देने का वचन दिया न कि केंद्रीय सरकार में शक्तियां।

इन हताश वर्षों में उम्मीद की कई किरणें फूटीं, पंरतु केंद्रीय सरकार में शक्तियां साझा करने की एक निष्पक्ष प्रणाली की कमी के चलते सभी धराशायी हो गईं। वर्ष 1944 में राजागोपालाचारी ने एक फार्मूला सामने रखा जिसके तहत एक प्रांत संघ से अलग हो सकता था। यह गांधी-जिन्ना वार्ता का आधार बना। परंतु यह वार्ता केवल 18 दिन बाद ही भंग हो गई। जिन्ना पाकिस्तान की संप्रभुता पर कोई भी अधिकार अब एक राष्ट्रीय सरकार को नहीं देना चाहते थे। सप्रू कमेटी, बीआर अंबेडकर, बीएन राव और कई अन्यों के प्रस्तावों के साथ भी यही हुआ।

अंतिम आशा ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के साथ 1946 में उभरी। इस तीन सदस्यीय समिति ने भारतीय जनता से ‘‘अपने समुदाय से आगे सोचने’’ की राय दी। ब्रिटिश मिशन ने भारतीयों की एक संविधान सभा और एक अंतरिम सरकार स्थापित करने की योजना प्रस्तुत की। मिशन ने लिखा कि अंगे्रजों को ‘‘उम्मीद थी कि भारतीय स्वयं नया संविधान बनाने के तरीके पर सहमत होंगे,  परंतु हमारे तमाम प्रयासों के बावजूद यह संभव नहीं हो पाया।’’ मिशन की योजना ने पाकिस्तान का विचार ठुकरा दिया, परंतु भारत की परिकल्पना प्रांतों के संघ के रूप में की जो आपस में समूह बनाने के लिए स्वतंत्र थे। ये समूह तय कर सकते थे कि कौन से विषय प्रांतीय रहेंगे और कौन से संघीय। परंतु एक बार फिर, संघीय सरकार संसदीय प्रणाली की ही सोची गई। लीग ब्रिटिश योजना से अलग हो गई, और देश का बंटवारा हो गया।

भारत अभी भी स्थायी बहुमत और अल्पमत में शक्तियां बांटने, और संघीय व राज्य सरकारों में संतुलन की गंभीर चुनौती का हल नहीं कर पा रहा है। परंतु जब तक ये मूलभूत मसले हल नहीं होंगे, हम दुनिया के एक महान देश बनने का सपना पूरा करने की उम्मीद नहीं कर सकते।

 

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 29 अगस्त 2018 के अंक में प्रकाशित।

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