देश के नागरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए अपनी मर्जी से वोट देने का अधिकार है, लेकिन चुने गए प्रतिनिधियों को संसद अथवा विधानसभा में अपनी मर्जी से वोट देने का अधिकार नहीं है। संसद अथवा विधानसभाओं में किसी भी मुद्दे पर वोटिंग से पहले ही हमें पता होता है कि उसके पक्ष अथवा विपक्ष में कितने वोट पड़ेंगे और यह भी कि कौन किस तरफ वोट देगा। इससे मतदान की प्रासंगिकता ही समाप्त हो जाती है और सांसद या विधायक पिंजरे के तोते की तरह बन कर रह जाते हैं…

पीके खुराना

हम एक लोकतांत्रिक देश हैं और हम गर्व से कहते हैं कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं। हमारा संविधान हमें कई अधिकार देता है, जिनमें मूल अधिकार भी शामिल हैं। मूल अधिकारों में समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार, संवैधानिक उपायों का अधिकार शामिल हैं, जो हमें संविधान द्वारा दिए गए हैं।

इन मूलभूत अधिकारों के अतिरिक्त संविधान में कुछ निर्देशक सिद्धांतों का जिक्र भी है और उम्मीद की जाती है कि हमारी सरकारें नए कानून बनाते समय इन निर्देशक सिद्धांतों की भावना का ध्यान रखेंगी, ताकि सरकारें लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में नागरिकों को आवश्यक सुविधाएं देना सुनिश्चित करें। अधिकारों के साथ-साथ संविधान में हमारे कुछ मूलभूत कर्त्तव्यों का उल्लेख भी है और नागरिकों से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करेंगे। इन सबके सम्मिलन से लोकतंत्र मजबूत होता है। भारतीय संविधान की मूल भावना को ‘जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार’ के रूप में व्यक्त किया गया है। यानी हमारे संविधान निर्माता हर स्तर पर आम आदमी और सरकार व प्रशासन में उसकी भागीदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के लिए कटिबद्ध थे। इसी कारण ग्राम पंचायत से लेकर लोकसभा तक हमने अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, हम अपनी पसंद के व्यक्ति को वोट देते हैं और सबसे ज्यादा वोट लेकर जीता हुआ प्रत्याशी पंच, सरपंच, पार्षद, महापौर, विधायक या सांसद बनकर जनसेवा की अपनी जिम्मेदारी पूरी करता है।

नियम यह है कि चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाले दल अथवा गठबंधन का नेता केंद्र में प्रधानमंत्री बनता है और चुनाव जीत कर आए सांसदों में से अपनी मंत्रिपरिषद के सदस्य चुनता है। सरकार की इस प्रणाली को संसदीय प्रणाली का नाम दिया गया है, क्योंकि यह माना गया कि इस प्रणाली में संसद सर्वोच्च है। संसद कानून बनाती है, न्यायपालिका उनकी व्याख्या करती है और कार्यपालिका उन कानूनों के अनुसार शासन चलाती है। संसद की सर्वोच्चता का दूसरा अर्थ यह है कि मंत्रिगण अपने हर कार्य के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी हैं और यदि प्रधानमंत्री या उनकी मंत्रिपरिषद का कोई सदस्य ऐसा करने में विफल रहे तो संसद उन्हें हटा दे।

अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदाता को बिना किसी दबाव के अपनी पसंद के प्रत्याशी को वोट देने का अधिकार है और यह हमारे लोकतंत्र की मजबूती का प्रमाण है कि मतदान करने वाले मतदाताओं का प्रतिशत बढ़ता जा रहा है। यही नहीं, गरीब-गुरबा भी मतदान में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेकर मतदान करते हैं। मतदान गुप्त होता है और गुप्त मतदान का यह तरीका इतना कारगर है कि चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी करने वाले बड़े-बड़े पंडित भी कई बार सटीक भविष्यवाणी में असफल रहते हैं। गुप्त मतदान का यह तरीका मतदाता की सबसे बड़ी शक्ति है और हमारे देश के नागरिकों ने समय आने पर इस शक्ति का भरपूर उपयोग किया है। इसी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री रहते हुए भी इंदिरा गांधी रायबरेली से राज नारायण के हाथों चुनाव हार गई थीं। एक जमाने में लोकप्रिय रहे मुख्यमंत्री और मंत्रिगण भी धूल चाट चुके हैं। मतदाता की यह शक्ति जन प्रतिनिधियों को मतदाताओं के प्रति उत्तरदायी बनाती है।

संसद का अधिकार है कि वह देश में शासन चलाने के लिए आवश्यक कानून बनाए, किसी पुराने कानून में संशोधन करे, या उसे पूरी तरह से निरस्त कर दे। हमारी सरकार सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी है और यदि सरकार संसद का विश्वास खो दे, तो उसे इस्तीफा देना पड़ता है। व्यवस्था यह है कि संसद कानून बनाएगी और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कार्यपालिका उसे लागू करेगी।

लेकिन व्यवहार में यहां कई पेंच छिपे हुए हैं। पहला तो यह कि प्रधानमंत्री को संसद का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही कभी भी संसद भंग करने और मध्यावधि चुनाव करवाने का अधिकार है। इससे सरकार, संसद पर हावी है और स्थिति उलट गई है, क्योंकि व्यवहार में संसद, सरकार के नियंत्रण में आ गई है।

संसद की शक्तियों के क्षरण की सीमा यह है कि संसद अपनी मर्जी से कोई कानून पास नहीं कर सकती, क्योंकि प्रधानमंत्री के दल का बहुमत है और संसद में सिर्फ वही बिल पास होते हैं, जो या तो सरकार द्वारा लाए जाते हैं या उन्हें सरकार का समर्थन प्राप्त होता है। परिणाम यह है कि दशकों के संसदीय इतिहास में केवल 14 निजी बिल कानून बन सके हैं और सन् 1970 के बाद एक भी निजी बिल कानून नहीं बन पाया है। कानून बनाने में विपक्ष की भूमिका सिर्फ आलोचना करने तक सीमित है, वह न कोई कानून बनवा सकता है और न रुकवा सकता है। ऐसे में यह धारणा कि संसद कानून बनाती है, असल में गलत है। सच्चाई यह है कि सरकार ही कानून बनाती है और सरकार ही कानून लागू भी करती है।

दूसरा महत्त्वपूर्ण पेंच यह है कि दल-बदल विरोधी कानून लागू होने के बाद पार्टी हाई कमान को पार्टी के मालिक सा हक मिल गया है और हाई कमान एक व्यक्ति या एक परिवार तक सीमित रहता है। दल के शेष छोटे-बड़े नेता हाई कमान के आदेशों को मानने के लिए विवश हैं। दल क्षेत्रीय हो या राष्ट्रीय, सब जगह एक सी कहानी है।

यहां तक कि भाजपा जैसे दल में भी वरिष्ठ नेताओं के साथ होने वाला व्यवहार हाई कमान की तानाशाही शक्ति को दर्शाता है। चुनाव में जीत के लिए पार्टी के लेबल का बहुत महत्त्व है, इसलिए राजनीति में सक्रिय कोई भी नेता पार्टी हाई कमान के निर्देशों की अवहेलना नहीं कर पाता। संसद या विधानसभा में किसी भी मुद्दे पर वोटिंग के समय पार्टियां व्हिप जारी करती हैं, जिसका अर्थ यह है कि उस पार्टी का सदस्य संसद या विधानसभा में पार्टी के आदेशों के अनुसार वोट देने के लिए विवश है।

इसका मतलब यह है कि देश के नागरिकों को अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए अपनी मर्जी से वोट देने का अधिकार है, लेकिन चुने गए प्रतिनिधियों को संसद अथवा विधानसभा में अपनी मर्जी से वोट देने का अधिकार नहीं है, चाहे वे अपनी पार्टी के स्टैंड से सहमत हों या नहीं। संसद अथवा विधानसभाओं में किसी भी मुद्दे पर वोटिंग से पहले ही हमें पता होता है कि उसके पक्ष अथवा विपक्ष में कितने वोट पड़ेंगे और यह भी कि कौन किस तरफ वोट देगा।

इससे मतदान की प्रासंगिकता ही समाप्त हो जाती है और सांसद या विधायक पिंजरे के उस तोते की तरह बन कर रह जाते हैं जो केवल सिखाए गए शब्द ही बोल सकते हैं। हमें यह निर्णय लेना ही होगा कि प्रतिनिधि चुनना चाहते हैं या तोते पालना चाहते हैं।

यह खेद का विषय है कि हमने और हमारे संविधान ने खुद ही लोकतंत्र को मजाक बना डाला है। यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि संविधान देश को सुचारू रूप से चलाए जाने के लिए बनाए जाते हैं। संविधान आस्था का नहीं, सुचारू प्रशासन का विषय है और संविधान की उन धाराओं पर खुली बहस होनी चाहिए जो लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कमजोर करती हों। मैं फिर दोहराता हूं कि संविधान आस्था का नहीं, सुचारू प्रशासन का विषय है और हमें खुले दिमाग से संविधान की समीक्षा करनी चाहिए, ताकि संविधान ही लोकतंत्र की मजबूती के आड़े न आए।

[लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं]

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल में 29/06/2017 को प्रकाशित हो चुका है।

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