एक अरब से अधिक हिंदुओं को एकजुट करने में बहुत लाभ है। यह किसी राजनेता या संगठन के लिए बहुत आकर्षक हो सकता है। परंतु अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि हिंदू पुनर्जागरण के लिए भी हिंदू एकता पहला आवश्यक कदम है…

[भानु धमीजा]

हिंदू एकता को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा शिकागो विश्व हिंदू सम्मेलन में की गई ताजा अपील ने बड़ी मात्रा में नकारात्मक प्रचार पाया है, परंतु गलत कारणों से। उनकी आलोचना एक उपमा के प्रयोग पर हुई जिसका आशय कुछ लोगों ने भारत के अल्पसंख्यकों का अपमान समझा। एकता के महत्त्व का संप्रेषण करते हुए भागवत ने कहा था कि, ‘‘शेर, अगर अकेला हो, तो जंगली कुत्ते एकत्रित होकर हमला कर सकते हैं और उसे खत्म कर सकते हैं।’’ भागवत पर आक्रमण सरासर शरारत थी। उनका यह सुझाव गलत नहीं था कि बिना एकता कोई भी समाज नष्ट हो सकता है। उनकी वास्तविक गलती यह थी कि वे हिंदुओं को एकता के लिए कोई नई रूपरेखा देने में असफल रहे।

निसंदेह हिंदुओं को एकजुट करना कठिन है। जैसा भागवत ने कहा, ‘‘वे कभी साथ नहीं आते, कभी साथ नहीं रहते, वे कभी साथ मिलकर काम नहीं करते। हिंदुओं का साथ आना अपने आप में ही एक कठिन कार्य है।’’ परंतु यह और भी बड़ा कारण है कि आज के मुख्य हिंदू नेता को आगे का रास्ता सुझाना चाहिए। इसके बजाय भागवत ने कहा, ‘‘हमें अलग रहकर साथ-साथ काम करना सीखना होगा।’’ उन्होंने समस्त हिंदुओं से प्रार्थना की कि वे जो भी करते हैं वह अच्छे ढंग से करें, अच्छे लोगों से जुड़ें, और समान परिकल्पना का अनुसरण करें। और फिर उन्होंने यह बात रखी कि कैसे ‘‘विश्व भर में लोग हिंदू ज्ञान की मांग करते हैं।’’

इसी बात में सबसे अधिक समस्या है। हिंदू एकता के प्रयास विफल रहते हैं क्योंकि वे केवल गौरवशाली अतीत पर निर्भर होते हैं। हमारे प्राचीन ‘‘ज्ञान’’ की हेकड़ी विभिन्न हिंदू संप्रदायों को एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने से रोकती है। हर संप्रदाय सोचता है कि उसके पास ही सर्वश्रेष्ठ उत्तर हैं। यह अहंकार और भी बढ़ जाता है क्योंकि हिंदू धर्म हर संप्रदाय को समान वेदों के आधार पर अपने को सही साबित करने की पर्याप्त स्वाधीनता देता है।

हिंदू एकता के लिए हुए असफल प्रयासों से इतिहास भरा पड़ा है। यहां तक कि चंद्रगुप्त मौर्य (300 ई.पू.) के हिंदू साम्राज्य की पराकाष्ठा में भी हिंदू संप्रदायों, जैसे कि जैनियों, बौद्धों और अजिविका, में प्रभुत्व के लिए होड़ थी। माना जाता है कि स्वयं मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया था। उसका पोता अशोक बौद्ध धर्म का मुख्य संरक्षक बना। आधुनिक समय में, ब्रह्म समाज, हिंदुओं को एक अद्वैतवादी छतरी के नीचे लाने के लिए राम मोहन राय द्वारा स्थापित आंदोलन, एक पीढ़ी के भीतर ही छिन्न-भिन्न हो गया। कई हिंदुओं की मांग थी कि इमसें बहुदेववाद और मूर्तिपूजा शामिल होनी चाहिए। हिंदू महासभा, ब्रिटिश राज के दौरान मुस्लिम लीग के मुकाबले हिंदू अधिकारों की रक्षा के लिए आरंभ किया गया प्रयास भी स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान ही असफल हो गया। हिंदू एकता को प्रस्तावित इसका ब्रांड — हिंदुत्व — धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं को आकर्षित करने में असफल रहा।

विवेकानंद ने हिंदुओं को एकजुट करने के महत्त्व और कठिनाई को समझा। ‘‘धर्म में एकता’’ उन्होंने एक बार कहा, ‘‘भारत के भविष्य की पहली शर्त और अति आवश्यक है।’’ जब लाहौर में एक व्याख्यान के लिए आर्य समाजियों और सनातनियों दोनों ने उनका स्वागत किया तो उन्होंने कहा, ‘‘इस देश में बहुत से संप्रदाय रहे हैं और भविष्य में भी काफी होंगे, क्योंकि यह हमारे धर्म की विशेषता रही है परंतु जो नहीं होना चाहिए वे हैं सांप्रदायिक झगड़े।’’

विवेकानंद ने ‘‘महान सिद्धांतों’’ का उल्लेख किया ‘‘जिनमें हम सब एक हैं, और स्वयं को हिंदू कहने वाला हर व्यक्ति विश्वास रखता है।’’ उनका वर्णन इस प्रकार थाः1) हमें विश्वास है कि वेद, धर्म के रहस्यों की शाश्वत शिक्षा है; 2) हम भगवान, जो संपूर्ण ब्रह्मांड के सृजक और संरक्षक शक्ति हैं में विश्वास रखते हैं; 3) हमें विश्वास है कि प्रकृति का न आरंभ है न ही अंत; और 4) समस्त हिंदू मानते हैं कि मानव मात्र एक सकल भौतिक शरीर, या सूक्ष्म काया, मस्तिष्क ही नहीं, परंतु इससे भी बढ़कर कुछ है — क्योंकि शरीर बदल जाता है और मस्तिष्क भी — इनसे भी ऊपर हैः आत्मा।

विवेकानंद ने यह कहकर बात समाप्त की, ‘‘उस व्यक्ति से पूछो जो सांप्रदायिक झगड़ा आरंभ करना चाहता है, क्या तुमने भगवान देखा है? क्या तुमने आत्मा देखी है? अगर नहीं, तो तुम्हें उसके नाम पर उपदेश देने का क्या अधिकार है — अंधेरे में चलते हुए तुम मुझे भी उसी अंधकार में ले जाने का प्रयास कर रहे हो — अंधे को अंधा राह दिखाए, और दोनों गड्ढे में गिरें?’’

विवेकानंद की योजना इन मौलिक आध्यात्मिक सिद्धांतों को जनसाधारण तक ले जाने, और इस उद्देश्य से अध्यापक वर्ग को तैयार करने की थी। वह यह चाहते थे कि भारत के लोगों को धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष — पूर्वी एवं पश्चिमी — दोनों शिक्षाएं दी जाएं।

हिंदू एकता के लिए विवेकानंद के महान सिद्धांतों में, हम तीन सिद्धांत और जोड़ सकते हैं। पहला, हिंदू विनम्रता में विश्वास करता है। हमारा भूतकाल यशस्वी हो सकता है, लेकिन हम आनुवांशिक रूप से बेहतर लोग नहीं हैं। हमारे पूर्वजों ने मनुष्य के कठिनतम प्रश्नों के कुछ रोचक उत्तर तलाश लिए, परंतु जानने और समझने के लिए और भी है। हिंदू एकता का एक महान उद्देश्य होना चाहिए, मात्र महान अतीत नहीं। दूसरा, हिंदुओं को समानता में विश्वास करना चाहिए। हमारी जाति व्यवस्था हमारे अपने लोगों को पीड़ा दे रही है। हिंदू एकता की किसी भी योजना की सफलता को दलितों को भी बराबरी से ‘हिंदू’ महसूस करना होगा। और तीन, हिंदुओं को सच्चे धर्मनिरपेक्षतावाद के आधार पर एकजुट होना चाहिए। आपसी आदर पर आधारित हमारे धर्म की निहित समग्रता, हमारी महानतम शक्ति है।

हिंदू धर्मनिरपेक्षवाद अमल में लाने के लिए सबसे कठिन सिद्धांत है। क्योंकि इसके लिए अनुयायियों में सांप्रदायिक और सार्वभौमिक सोच, दोनों की आवश्यकता है। हिंदुत्व की सार्वभौमिकता की दलाली करते हुए, अधिकतर सुधार और एकता के आंदोलन हिंदुओं को संप्रदायवाद के आधार पर एकजुट करने की आशा करते हैं। दोनों फायदों को उठाने के प्रयास के लिए नियंत्रणों और संतुलनों की आवश्यकता है। ताकि सांप्रदायिक हिंदू बहुमत, हिंदू धर्म को कट्टर धर्म में न बदल सके।

एक अरब से अधिक हिंदुओं को एकजुट करने में बहुत लाभ है। यह किसी राजनेता या संगठन के लिए बहुत आकर्षक हो सकता है। परंतु अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि हिंदू पुनर्जागरण के लिए भी हिंदू एकता पहला आवश्यक कदम है।

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 3 अक्टूबर 2018 के अंक में प्रकाशित।

Advertisements