भाजपा के एक ‘धर्म राज्य’ की परिकल्पना और इसका संविधान, जैसा इसके मुख्य विचारक पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने वर्णित किया है, हमारे मौजूदा संविधान से बहुत अलग और खतरनाक रूप से त्रुटिपूर्ण है…

[भानु धमीजा]

कांग्रेस पार्टी का हालिया ‘संविधान बचाओ’ अभियान इस भय पर आधारित है कि भाजपा संविधान को विकृत कर रही है और इसे संशोधित करने जा रही है। दोनों डर प्रमाणिक हैं। भाजपा के एक ‘धर्म राज्य’ की परिकल्पना और इसका संविधान, जैसा इसके मुख्य विचारक पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने वर्णित किया है, हमारे मौजूदा संविधान से बहुत अलग और खतरनाक रूप से त्रुटिपूर्ण है।

उपाध्याय जीवन पर्यंत हमारे संविधान के आलोचक रहे। वर्ष 1965 में उन्होंने अपने ‘एकात्म मानववाद’ (Integral Humanism) के सिद्धांतों के तहत इसे बदलने की अपनी योजना प्रस्तुत की। एक नए भारत, ‘धर्म राज्य’ के विषय में उनके विचार भाजपा द्वारा इसके आधिकारिक दर्शन के तौर पर अंगीकृत कर लिए गए। आज दिन तक पार्टी उपाध्याय की परिकल्पना के अनुरूप भारत के पुनर्निर्माण की आकांक्षा रखती है।

कुछ पार्टी विचारक पहले ही एक नया संविधान तैयार करने में जुटे हैं। वर्ष 2016 में आरएसएस विचारक और एक समय भाजपा के शक्तिशाली महासचिव रहे केएन गोविंदाचार्य ने साक्षात्कार में स्पष्ट कहाः ‘‘हम भारतीयता को प्रतिबिंबित करने के लिए संविधान फिर लिखेंगे।’’ पिछले दिसंबर माह में भाजपा के केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी कहाः ‘‘हम यहां संविधान बदलने आए हैं और हम इसे जल्द ही बदल देंगे।’’ गोविंदाचार्य कह चुके हैं कि इस साल के अंत तक संविधान का एक नया ढांचा उपलब्ध होगा, और कि उनकी टीम अब इस पर ‘‘बहुत खामोशी’’ से काम कर रही है।

उपाध्याय के विचार प्रेरक हो सकते हैं, परंतु वे व्यवहारिक नहीं हैं। वे एक ऐसे विचारक के ख्वाब हैं जिसे वास्तविक शासन का कम ही अनुभव था। उनके विचारों में एकल-व्यक्ति विचार संबंधी कमियां भी हैं। देश के लिए क्या अच्छा है यह सब एक अकेला व्यक्ति नहीं जान सकता, खासकर भारत जैसे विविध और चुनौतीपूर्ण राष्ट्र के बारे में। कई देश इस राह पर चल चुके हैं, केवल यह सीखने के लिए कि एक विशाल व विविध राष्ट्र पर शासन के लिए एकल-व्यक्ति की विचारधारा सही नहीं है। वैसे भी लोकतांत्रिक देश का संविधान बिना सार्वजनिक बहस पर्दे के पीछे चुपचाप तैयार नहीं किया जाना चाहिए।

क्या ‘धर्म राज्य’ धर्मनिरपेक्ष हो सकता है?

उपाध्याय की विचारधारा में मुख्य अव्यवहारिकता वही है जैसी सावरकर की हिंदुत्व की संकल्पना में। दोनों विश्व को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि एक हिंदू बहुल राष्ट्र सांप्रदायिक नहीं होगा, क्योंकि हिंदुत्व स्वाभाविक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। उपाध्याय तो हिंदू और हिंदुत्व शब्दों से पूर्णतया दूर रहे। इसके बजाय उन्होंने एक भारतीय संस्कृति की बात कही, जो व्यक्ति को प्रकृति, समाज, परिवार और मानवता के एक अभिन्न अंग के रूप में देखती है। ‘‘धर्म राज्य का अर्थ एक धर्मतंत्र राज्य (Theocratic State) नहीं है,’’ उन्होंने लिखा, ‘‘जहां एक विशेष समुदाय और इसके पैगंबर या गुरु का शासन सर्वोपरि हो। सभी अधिकारों का उपभोग इस विशेष समुदाय के अनुयायियों द्वारा किया जाए अन्य या तो उस देश में रह ही न सकें या एक दास-सरीखा दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन व्यतीत करें।’’

परंतु एक देश ‘धर्म राज्य’ की इस धारणा को जमीन पर मूर्तरूप कैसे दे सकता है, जब लोग ‘धर्म’ को ‘हिंदू धर्म’ से जोड़कर देखते हैं? सरकार की व्यवस्था, जहां अधिकतर पदाधिकारी हिंदू हों, निर्णय लेते समय धार्मिक तरफदारी से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकती। साथ ही, समुदायों को दूसरों के संप्रदायवाद के विरुद्ध प्रतिक्रिया देने से रोकना असंभव है। सरकार की खैरातों की भी समस्या हैः एक गैर-धर्मतांत्रिक देश में सरकार कैसे निर्णय लेगी कि किन धार्मिक गतिविधियों को प्रायोजित किया जाए और किन्हें नकारा जाए?

सरकारों में धार्मिक कट्टरता को वास्तव में दूर रखने का एकमात्र रास्ता यही है कि उन्हें किसी भी धर्म की गतिविधियों में शामिल होने से प्रतिबंधित किया जाए। दूसरे शब्दों में, पश्चिमी-तर्ज की धर्मनिरपेक्षता अपनाई जाए। परंतु उपाध्याय और उनके अनुयायी अपने संविधान में कुछ भी पश्चिमी नहीं चाहते।

उन्होंने कहा, ‘‘एक सरकार न तो बिना धर्म (नि-धर्म) और न ही धर्म के प्रति उदासीन (धर्म-निरपेक्ष) हो सकती है। जैसे कि आग बिना गर्मी के नहीं हो सकती। सरकार केवल धर्म राज्य (धर्म का शासन) हो सकती है, और कुछ भी नहीं।’’

क्या धर्म विधिबद्ध किया जा सकता है?

उपाध्याय की परिकल्पना में दूसरा अव्यवहारिक दृष्टिकोण है कि धर्म कैसे निर्धारित होगा, और किसके द्वारा? उन्होंने धर्म को विभिन्न प्रकार से वर्णित किया है, जैसे कि नैतिकता के सिद्धांत, जीवन के नियम, समरसता लाने वाले सिद्धांत, व्यवहार का औचित्य तय करने वाले मानक, आदि।

ये निश्चित रूप से अच्छे विचार हैं, परंतु शासन के लिए बहुत अस्पष्ट। उन्होंने कुछ उदाहरण भी दिएः सच्चाई, क्रोध न करना, ईमानदारी। ‘‘अंग्रेजी शब्द ‘रिलिजन’ (Religion) धर्म के लिए सही शब्द नहीं है,’’ उपाध्याय ने कहा। ‘‘इसका निकटतम समान अर्थ ‘प्राकृतिक विधान’ (Innate Law) हो सकता है।’’

परंतु कौन से संवैधानिक प्रावधान ऐसे विधान को विधिबद्ध कर सकते हैं? विशेष रूप से तब, जैसा उपाध्याय ने स्वयं कहा, वे हर व्यक्ति द्वारा ‘‘खोजे’’ जाते हैं और उन्हें ‘‘मनमाने ढंग से बनाया’’ नहीं जा सकता? अगर उन नियमों को कर्त्तव्यों के रूप में सूचीबद्ध किया जाएगा तो एक संविधान उन्हें कैसे न्यायोचित बनाएगा? अगर वे एक राष्ट्र गुरु द्वारा बनाए जाएंगे, यह गुरु कैसे चुना जाएगा? और अगर एक मंडली या एक विधायिका उन्हें बनाएगी, तो बिना किसी कानूनी आधार वाले सिद्धांत कैसे लागू होंगे? ये प्रश्न मन में संदेह पैदा करते हैं।

क्या एक व्यक्ति का एक वोट होगा?

उपाध्याय की परिकल्पना एक और वजह से अव्यवहारिक थी। उपाध्ययाय एकल-व्यक्ति को भारत के नए संविधान के आधार के रूप में अस्वीकार करते हैं। वह समाज में समूहों, जैसे कि परिवार, को आधिपत्य देना चाहते थे। वह उस पश्चिमी सिद्धांत को अस्वीकृत करते थे कि सरकारें व्यक्तियों के बीच एक सामाजिक अनुबंध का परिणाम होती हैं, जिससे वे लोकहित के लिए अपने कुछ अधिकार छोड़ देते हैं। इसके बजाय उपाध्याय ने कहा, ‘‘शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को समाविष्ट करने वाला व्यक्ति एकवचन ‘मैं’ तक सीमित नहीं बल्कि बहुवचन ‘हम’ से भी अभिन्न रूप से संबंधित है। इसलिए हमें समूह या समाज के विषय में भी अवश्य सोचना चाहिए।’’

इसका अर्थ है कि उपाध्याय के संविधान में ‘‘वी द पीपल’’ (We The People) का अर्थ इसके अमरीकन आविष्कारकों के मतलब से भिन्न होगा। यह एक समुदाय पर लागू होगा, जहां सामाजिक या पारिवारिक समूहों को एकल-व्यक्तियों से अधिक अधिकार उपलब्ध होंगे।

यह मूलभूत लोकतांत्रिक युक्ति, वोट, के विषय में बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। प्राथमिक मतदाता कौन होगा, व्यक्ति या एक परिवार? क्या एक व्यक्ति-एक वोट का सिद्धांत लागू होगा? क्या प्रत्येक मत का बराबर मूल्य होगा? अगर ‘‘वी द पीपल’’ एकल व्यक्तियों के बजाय समूहों का प्रतिनिधित्व करता है, तो क्या भारत फिर भी सही मायने में एक गणतंत्र माना जाएगा?

क्या बिना स्थानीय सरकारों के विकेंद्रीकरण हो पाएगा?

उपाध्याय के विचारों में भारतीय संघ के ढांचे से संबंधित एक और अव्यवहारिकता भी जुड़ी है। उन्होंने ग्राम पंचायतों के स्तर तक वास्तविक रूप से विकेंद्रीकृत सरकार का पक्ष लिया। परंतु उन्होंने संपूर्ण संघीय ढांचे पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, ‘‘यह भारत की एकता और अविभाज्यता के लिए सही नहीं।’’ ‘‘संविधान के पहले पैराग्राफ के अनुसार, ‘इंडिया’, मायने भारत, राज्यों का एक संघ होगा, अर्थात, बिहार माता, बंग माता, पंजाब माता, कन्नड़ माता, तमिल माता, सबके मेल से भारत माता बनती है। यह हास्यस्पद है। राज्यों के विषय में हमारा विचार भारत माता के अंगों के रूप में है अलग-अलग माताओं के तौर पर नहीं। इसलिए हमारा संविधान संघीय के बजाय एकात्मक होना चाहिए।’’

परंतु एक एकात्मक संविधान में स्थानीय सरकारों को कौन जवाबदेह बनाएगा? स्थानीय लोगों को उनकी अपनी सरकारों पर नियंत्रण दिए बिना हम एक विकेंद्रीकृत ढांचे को कैसे सफल बना सकते हैं?

अगर हम स्थानीय जनता पर यह भरोसा करने के लिए तैयार नहीं हैं कि वह खुद जानते हैं कि उनके लिए सर्वोत्तम क्या है, तो इस नए संविधान से किस प्रकार का गणतंत्र तैयार होगा? और कैसे एक एकात्मक संविधान एक जनता के समूह को संघटन में बने रहने के लिए मजबूर करेगा, अगर वे सचमुच ऐसा नहीं चाहते?

भारतीय संविधान को एक विचारधारा के लिए उपकरण के रूप में प्रयोग करने का प्रयास बहुत बड़ी भूल होगी। हम ऐसी शरारतों के परिणाम पहले ही भुगत रहे हैं। इसलिए, जबकि यह मजबूती से कहा जा सकता है कि हमारे संविधान को संशोधन की आवश्यकता है, आइए सुनिश्चित करें कि बदलाव एक व्यक्ति की अव्यवहारिक विचारधारा थोपने के लिए नहीं, पर शासन सुधारने के लिए किया जाए।

[लेखक ‘दिव्य हिमाचल’ समाचारपत्र के संस्थापक और ‘राष्ट्रपति प्रणाली: कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ पुस्तक के रचनाकार हैं ]

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 6 जून 2018 के अंक में प्रकाशित।

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