विश्व गुरु बनने से सभी भारतीय गौरवान्वित होंगे। हम सभी उन दिनों के वैभव को तरसते हैं जब हमारे लोग विचार के शिखर पर जा पहुंचे थे, दिव्यता की महान समझ प्राप्त की थी, और जीवनयापन के उत्कृष्ट तरीकों का आविष्कार किया था। परंतु विश्व गुरु पद सरलता से वापस नहीं मांगा जा सकता। इसे नए सिरे से हासिल करना होगा। हमारे लोगों को आधुनिक समय के अनुरूप नई सोच के साथ एक बार फिर तपस्या करनी होगी…

[भानु धमीजा ]

भारत को विश्व गुरु यानी समूची दुनिया के लिए एक सुधारक और शिक्षक बनाना एक महान प्रयास है। भाजपा व आरएसएस की जोड़ी ने इस साहसिक अभियान का बीड़ा एक दशक से भी पहले उठाया था। परंतु आशंका है कि वे असफल रहेंगे।

उनकी सोच भारत के अतीत पर आधारित है, वर्तमान पर नहीं। और इसमें व्यावहारिक दृष्टिकोण का अभाव है। देश के गौरवशाली अतीत से उपलब्ध ताकतों को इस्तेमाल करने के स्थान पर, उनकी रणनीतियां इन शक्तियों को व्यर्थ गंवा रही हैं।

विश्व गुरु बनने से सभी भारतीय गौरवान्वित होंगे। हम सभी उन दिनों के वैभव को तरसते हैं जब हमारे लोग विचार के शिखर पर जा पहुंचे थे, दिव्यता की महान समझ प्राप्त की थी, और जीवनयापन के उत्कृष्ट तरीकों का आविष्कार किया था। परंतु विश्व गुरु पद सरलता से वापस नहीं मांगा जा सकता। इसे नए सिरे से हासिल करना होगा। हमारे लोगों को आधुनिक समय के अनुरूप नई सोच के साथ एक बार फिर तपस्या करनी होगी। हम तभी गुरु बन सकते हैं जब वैश्विक समुदाय हमें इस रूप में मान्यता दे। हम अपनी गुरुशाही उन पर थोप नहीं सकते।

‘‘अगर आप सच्चे सुधारक बनना चाहते हैं तो तीन चीजें आवश्यक हैं। पहली है महसूस करना। क्या आप सचमुच अपने भाइयों की पीड़ा अनुभव करते हैं?… क्या आप सहानुभूति से ओत-प्रोत हैं?… आपको आगे सोचना होगा कि क्या आपने कोई उपचार खोज लिया है। पुराने विचार सब अंधविश्वास हो सकते हैं, परंतु भीतर ये अंधविश्वास कहीं स्वर्ण हैं…क्या आपने बिना किसी अशुद्धि उस सोने को सहेजने के तरीके खोज लिए हैं? अगर आपने ऐसा कर लिया है, एक और चीज आवश्यक है। आपका इरादा क्या है? क्या आपको विश्वास है कि आप लालच, प्रसिद्धि या शक्ति की पिपासा से प्रेरित नहीं हैं?…तब आप एक सच्चे सुधारक हैं, आप मानवता के लिए एक शिक्षक, एक गुरु, एक आशीष हैं।’’ – स्वामी विवेकानंद

एक गुरु बनने के लिए क्या आवश्यक है इसकी व्याख्या स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने सर्वप्रथम भारत को यह अभिलाषा दी, ने स्वयं की थी। अपने निबंध ‘माई मास्टर’ (1901) में उन्होंने लिखा : ‘‘अगर आप सच्चे सुधारक बनना चाहते हैं तो तीन चीजें आवश्यक हैं। पहली है महसूस करना। क्या आप सचमुच अपने भाइयों की पीड़ा अनुभव करते हैं?… क्या आप सहानुभूति से ओत-प्रोत हैं?… आपको आगे सोचना होगा कि क्या आपने कोई उपचार खोज लिया है। पुराने विचार सब अंधविश्वास हो सकते हैं, परंतु भीतर ये अंधविश्वास कहीं स्वर्ण हैं…क्या आपने बिना किसी अशुद्धि उस सोने को सहेजने के तरीके खोज लिए हैं? अगर आपने ऐसा कर लिया है, एक और चीज आवश्यक है। आपका इरादा क्या है? क्या आपको विश्वास है कि आप लालच, प्रसिद्धि या शक्ति की पिपासा से प्रेरित नहीं हैं?…तब आप एक सच्चे सुधारक हैं, आप मानवता के लिए एक शिक्षक, एक गुरु, एक आशीष हैं।’’

विश्व गुरु की पदवी पर भारत का दावा प्राचीन विचार पर आधारित है : वसुधैव कुटुंबकम, समूचा विश्व एक परिवार है। हम तर्क देते हैं कि क्योंकि हमने सबसे पहले ऐसा कहा, और मात्र हम ही इन उपदेशों का पालन करते हैं, इसलिए हम विश्व गुरु बनने के लिए विशिष्ट तौर पर योग्य हैं। यह सत्य हो सकता है, परंतु इसे कोई मान नहीं रहा।

सभी धर्म नैतिक श्रेष्ठता का दावा करते हैं। और जिस प्रकार भाजपा व आरएसएस यह मामला उठा रहे हैं, हम अन्य धर्मों की तरह ही नजर आते हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की ताजा अपील पर गौर करें: भारत के नेतृत्व में ‘‘समूचा विश्व वसुधैव कुटुंबकम के आधार पर अपना खोया संतुलन पुनः प्राप्त करे और धर्म की राह पर चले।’’

आज अगर भारत चाहता है कि उसे एक विशेष राष्ट्र के रूप में देखा जाए, इसे आधुनिक युग की समस्याओं के हल प्रस्तुत करने होेंगे।

विविधता, धार्मिक अतिवाद, असमानता और तानाशाही की समस्याएं व्यग्रतापूर्वक नए उत्तरों की प्रतीक्षा में हैं। भारतविद् बेशक तर्क देंगे कि उनके हल वेदों और महाभारत में छिपे हैं। ईसाई और मुस्लिम भी उनकी पवित्र पुस्तकों के विषय में ऐसा ही कहते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि भारत के पास अद्वितीय शक्तियां नहीं हैं। दरअसल इसके पास सार्वभौमिक दर्शन, स्वाभाविक सहिष्णु धर्म, बड़ा भू-भाग, युवा आबादी, लोकतंत्र, और विविधता का ऐसा दुर्लभ संयोजन है जिसकी बराबरी कोई और देश नहीं कर सकता। महत्त्वपूर्ण यह है कि इन ताकतों को व्यर्थ गंवाने के बजाय उनका सही इस्तेमाल किया जाए। इसके लिए कुछ सुभाव हैं।

पहला, भारत को एक नई शासन प्रणाली का आविष्कार करना चाहिए जो विविध आबादियों के प्रबंधन में विश्व को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाए। ऐसा स्थानीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय प्रभुत्व का मिश्रण उपलब्ध करवाकर किया जा सकता है। यह अन्य देशों के लिए उनकी ‘विविधता में एकता’ के प्रबंधन को एक मॉडल हो सकता है। इसके बजाय, भारत स्थानीय नियंत्रण नकारने और निरंकुश केंद्रीय सरकारें थोपने में व्यस्त रहा है।

दूसरा, धार्मिक कट्टरता नियंत्रित करने में भारत रोल मॉडल बन सकता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों से ताकत के बल पर हमेशा के लिए छुटकारा पाना या उन पर शासन करना संभव नहीं। भारत को अपने अल्पसंख्यकों को सत्ता में उचित हिस्सेदारी देने के लिए कोई रास्ता खोजना चाहिए, ताकि वे हमारे राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सच्चे भागीदार बनें। परंतु भाजपा और आरएसएस सभी पर हिंदुवाद थोपने के मामले में नाम कमा रहे हैं।

जो सुब्रह्मण्यन स्वामी की तरह यह सोचते हैं कि कुछ समय के लिए हिंदू एकता और आधिपत्य आवश्यक है, उन्हें अंदाजा नहीं कि विश्व भर में हिंदुत्व की प्रतिष्ठा और देश में इसकी परिपाटी को लंबे समय के लिए नुकसान पहुंचाया जा रहा है। साधना व चिंतन के धर्म को कट्टरता के धर्म में बदला जा रहा है।

तीसरा, भारत पूंजीवाद और समाजवाद का ऐसा संतुलन भी तलाश सकता है जिसे दुनिया अपना सके। ऐसा कल्याणकारी राज्य की सर्वोत्तम प्रथाएं सहेजते हुए और सरकार की भूमिका सीमित कर किया जा सकता है। इसके बजाय, सत्ता की तलाश में, भाजपा वोट बटोरने वाले समाजवाद के पुराने तरीके अपना रही है।

चौथा, विश्व भर में लोग तानाशाह सरकारों के अधीन पीडि़त हैं। भारत उन्हें आगे बढ़ने की राह दिखा सकता है। इसके पास दुनिया के सबसे मजबूत लोकतंत्रों में से एक है, परंतु हमारी जनता की सहभागिता मतदान तक ही सीमित है। भारत अपनी संस्थाओं का विकेंद्रीकरण कर भागीदारीपूर्ण लोकतंत्र का एक मजबूत मॉडल बना सकता है। इसके बजाय यह सत्ता केंद्रीकरण के नेहरूवादी मॉडल पर और जोर दे रहा है।

निःसंदेह ये समस्याएं बहुत बड़ी हैं। आखिरकार विश्व गुरु बनना कोई आसान उपलब्धि नहीं।

 

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 29 नवंबर 2017 के अंक में प्रकाशित।

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