विविध राज्यों के एक अविभाज्य संघ की उपाध्याय की धारणा भी राष्ट्रपति शासन प्रणाली से अधिक मेल खाती है। शासन का अमरीकी मॉडल संघीय कहलाता है, परंतु यह संसदीय प्रणाली के मुकाबले अधिक अविभाज्य संघ का गठन करता है। क्योंकि इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो राज्यों को राष्ट्रीय संविधान का उल्लंघन करने की अनुमति दे…

[भानु धमीजा]

एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी ने भारत की शासन व्यवस्था बदलने का निर्णय ले लिया था। राष्ट्रपति शासन प्रणाली में वाजपेयी की रुचि की कहानी का मैं उल्लेख करना चाहूंगा। वर्ष 1998 में एक भाषण में वाजपेयी ने स्पष्ट कहा कि ‘‘हमें राष्ट्रपति प्रणाली की विशेषताओं पर चर्चा करनी चाहिए।’’ उन्होंने कहा ‘‘मैं अक्सर सोचता हूं कि क्या ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली का मॉडल भारतीय वास्तविकता से हार गया है।’’ उनके गृह मंत्री आडवाणी ने भी राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने पर जोर देने को अपने विचार रखे और लेख लिखे। वह तो यहां तक कह गए कि ‘‘संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत हमें संसदीय लोकतंत्र रखने पर बाध्य नहीं करता।’’ इस बात में वह सही थे। हमारे संविधान की बुनियादी संरचना शक्तियों का पृथक्करण है न कि संसदीय प्रणाली। और शक्तियों के पृथक्करण के लिए राष्ट्रपति प्रणाली से बेहतर कोई व्यवस्था नहीं।

परंतु क्या भाजपा वास्तव में राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपना सकती है? क्या कोई संभावना है कि यह अभी भी हो सकता है?

हम सब देख रहे हैं कि मोदी कैसे राष्ट्रपति प्रणाली के अंदाज में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। उन्हें एकल नेता का प्रभुत्व, और संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक चुनाव, की संकल्पना प्रिय है। राष्ट्रपति प्रणाली के मॉडल के उनके विचार से लगता है कि वह उस प्रणाली को अपनाने के लिए इच्छुक होंगे।

परंतु क्या आरएसएस ऐसा चाहेगा?

मैंने संघ और भाजपा के मुख्य विचारक दीनदयाल उपाध्याय के विचार समझने का प्रयास किया है। उपाध्याय जीवन पर्यंत हमारे संविधान के आलोचक रहे। व्यवस्था बदलने के लिए वर्ष 1965 में उन्होंने अपने सैद्धांतिक दर्शन ‘एकात्मक मानववाद’ की अपनी योजनाएं प्रस्तुत कीं। एक नए भारत, एक ‘धर्म राज्य’ के विषय में उनके विचार भाजपा द्वारा अपने आधिकारिक सिद्धांत के रूप में अपना लिए गए। आज दिन तक, पार्टी भारत को उपाध्याय की परिकल्पना के अनुरूप पुनर्निर्मित करने की इच्छा रखती है।

कुछ बीजेपी और आरएसएस विचारक पहले ही एक नया संविधान बनाने में जुटे हैं। वर्ष 2016 में आरएसएस विचारक और एक समय भाजपा के शक्तिशाली महासचिव रहे गोविंदाचार्य ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट कहा थाः ‘‘भारतीयता प्रतिबिंबित करने के लिए हम संविधान दोबारा लिखेंगे।’’ वर्ष 2017 में भाजपा के केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी कहा, ‘‘हम यहां संविधान बदलने आए हैं और हम इसे जल्द बदलेंगे।’’

उपाध्याय के मन में किस प्रकार की प्रणाली थी?

उपाध्याय के अधिकतर विचार राष्ट्रपति शासन प्रणाली के साथ मेल खाते हैं। दरअसल उपाध्याय के विचार संसदीय प्रणाली की अपेक्षा राष्ट्रपति प्रणाली के अधिक अनुरूप हैं।

मैं उनके तीन प्रमुख विचारों का उदाहरण दूंगा।

उन्होंने लिखा, ‘‘धर्म राज्य का अर्थ धर्म शासित राज्य नहीं, जहां एक संप्रदाय विशेष और इसके पैगंबर या गुरु का शासन सर्वोच्च हो। जहां सभी अधिकार इस संप्रदाय विशेष के अनुयायियों के पास हों। अन्य या तो उस देश में ही न रह सकें या गुलाम-सरीखा, द्वितीय श्रेणी का दर्जा रखते हों।’’

अगर हम बेकार की बहस में न पड़ें कि धर्म का मतलब क्या है, या हिंदुत्व, या भारतीयता क्या है, तो उपाध्याय का मूल विचार कि भारत एक धर्म शासित राज्य नहीं होना चाहिए और यहां सभी संप्रदायों के लोग समान होने चाहिएं, संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली से अधिक मेल खाता है।

क्योंकि संसदीय प्रणाली में, जैसा हम जानते हैं, बहुमत का शासन होता है। एक हिंदू बहुल राष्ट्र में इसका अर्थ है एक सांप्रदायिक सरकार का होना। जिसे उपाध्याय, मुझे विश्वास है, मंजूर नहीं करेंगे, और उन्होंने किया भी नहीं।

उनके लिए धर्म का अर्थ था ‘प्राकृतिक विधान’, जो सार्वभौमिक है। और सच्ची धर्म निरपेक्षता से अधिक सार्वभौमिक कुछ भी नहीं है। ऐसी धर्मनिरपेक्षता जहां सरकार किसी धर्म को स्थापित करने, या किसी धर्म का तुष्टिकरण करने, या उसे हानि पहुंचाने में शामिल नहीं होती।

उपाध्याय का शासन का दूसरा सिद्धांत था कि ‘व्यक्ति’ संविधान का आधार नहीं होना चाहिए। उनकी इच्छा थी कि ‘समुदाय’ को शासन में ज्यादा महत्त्व मिले। एक बार फिर, यह सिद्धांत संसदीय की अपेक्षा राष्ट्रपति शासन प्रणाली से अधिक मिलता है। राष्ट्रपति प्रणाली विकेंद्रीकृत है, इसलिए समुदाय स्व-शासन में अधिक संलग्न हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, अमरीका में स्कूल डिस्ट्रिक्ट्स से लेकर एंबुलेंस सेवाओं और सार्वजनिक सुविधाओं तक 90,000 स्थानीय स्व-शासन निकाय हैं। ये सब स्थानीय समुदायों द्वारा स्वयं चलाए जाते हैं।

तीसरा, उपाध्याय वर्तमान संविधान के विरुद्ध थे क्योंकि इसने भारत की अखंडता को खतरे में डाला। उन्होंने लिखा कि ‘‘संविधान के पहले पैराग्राफ के अनुसार, इंडिया, यानी भारत, राज्यों का संघ है, यानी, बिहार माता, बांग्ला माता, पंजाब माता, कन्नड़ माता, तमिल माता, सब मिलकर भारत माता बनती है। यह हास्यास्पद है, उन्होंने कहा। हमने राज्यों को भारत माता के अंगों के रूप में देखा है, अलग-अलग माताओं के रूप में नहीं। इसलिए हमारा संविधान संघीय के बजाय ऐकिक होना चाहिए।’’

विविध राज्यों के एक अविभाज्य संघ की उपाध्याय की धारणा भी राष्ट्रपति शासन प्रणाली से अधिक मेल खाती है।

शासन का अमरीकी मॉडल संघीय कहलाता है, परंतु यह संसदीय प्रणाली के मुकाबले अधिक अविभाज्य संघ का गठन करता है। क्योंकि इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो राज्यों को राष्ट्रीय संविधान का उल्लंघन करने की अनुमति दे। आज हमारी संसद राज्य सरकारों को खतरनाक संबंध-विच्छेद की शक्तियां प्रदान कर सकती है। जैसा कि हम जानते हैं, कश्मीर और असम या नागालैंड आदि के विषय में ऐसा ही हुआ है। अमरीका जैसे संविधान के तहत यह संभव नहीं होता। विधायिका के पास राष्ट्रीय संविधान की सीमा से बाहर जाने की कोई शक्ति नहीं होती। यह अमरीकी संविधान का अटूट संघ ही था जिसने उस देश को टुकड़े-टुकड़े होने से बचा लिया, यहां तक कि उनके गृहयुद्ध के दौरान भी।

इस प्रकार उपाध्याय द्वारा सुझाए सभी तीन सिद्धांतोंः सार्वभौमिक विधान, अविभाज्य संघ, और समुदाय स्व-शासन के लिए राष्ट्रपति प्रणाली बेहतर विकल्प होगी।

इसलिए मुझे बहुत उम्मीद है कि भाजपा दिग्गज इस प्रणाली को अपनाने के विषय में एक बार फिर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे।

जय हिंद

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 1 मई 2019 के अंक में प्रकाशित।