संसदीय प्रणाली की पसंद दरअसल एक राजनीतिक पार्टी का निर्णय था। यह 1946 की गर्मियों में कांग्रेस पार्टी की एक मीटिंग के दौरान लिया गया था। उसके बाद एक पार्टी के निर्देश के रूप में इसे संविधान निर्माण प्रक्रिया पर लागू किया गया…

संसदीय प्रणाली पर एकमत नहीं थे नेहरू, अंबेडकर और पटेल

[भानु धमीजा]

बहुत से भारतीय सोचते हैं कि शासन की संसदीय प्रणाली हमारी संविधान सभा का एक विचारपूर्वक चयन था। वे सोचते हैं कि देश के श्रेष्ठतम संविधान विशेषज्ञों ने सदन में ज्ञानपूर्वक बहस की, और अंत में इस प्रणाली के पक्ष में वोट डाला। कुछ तो यहां तक सोचते हैं कि निर्णय सर्वसम्मत था, और जवाहरलाल नेहरू, बीआर अंबेडकर और वल्लभभाई पटेल की इस पर समान सोच थी। यह सब असत्य है।

संसदीय प्रणाली की पसंद दरअसल एक राजनीतिक पार्टी का निर्णय था। यह 1946 की गर्मियों में कांग्रेस पार्टी की एक मीटिंग के दौरान लिया गया था। उसके बाद एक पार्टी के निर्देश के रूप में इसे संविधान निर्माण प्रक्रिया से लागू किया गया। संविधान सभा के लिए कांग्रेस ने नेहरू की अध्यक्षता में एक ‘विशेषज्ञ समिति’ बनाई थी, और 15 अगस्त की बैठक में इस छोटी सी समिति ने निर्णय लिया कि स्वतंत्र भारत में ब्रिटिश-प्रकार की सरकार होगी।

उस समय, न अंबेडकर और न ही पटेल एक विशुद्ध संसदीय प्रणाली के पक्ष में थे। और न ही गांधी या जिन्ना, हालांकि वे हमारा संविधान बनाने की प्रक्रिया में शामिल नहीं थे। ज्यों-ज्यों संविधान बनाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी, अंबेडकर और पटेल, दोनों एक अलग प्रकार की सरकार को लेकर अपने विचार संविधान सभा में लाए। परंतु वे या तो अस्वीकार या उपेक्षित कर दिए गए। जहां तक जिन्ना का सवाल है, उन्होंने 1939 में ही संसदीय प्रणाली के प्रति अपने ‘‘अटल विरोध’’ की घोषणा कर दी थी। और गांधी ने कहा था, ‘‘अगर भारत इंग्लैंड की नकल करता है, तो यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह बर्बाद हो जाएगा।’’

जब वर्ष 1946 के अंत में संविधान सभा ने काम आरंभ किया, तो नेहरू की ही अध्यक्षता में बनी ‘संघटन संविधान समिति’ के लिए कांग्रेस ‘विशेषज्ञ समिति’ के निर्णय सिफारिशें बन गए। परंतु पटेल की अध्यक्षता में ‘प्रांतीय संविधान समिति’ एक अलग योजना लेकर सामने आई।

इन दोनों समितियों में असहमति दो बिंदुओं पर थीः 1) भारत एकात्मक देश हो या संघीय, और 2) सरकार-प्रमुख (राष्ट्रपति) सीधे जनता द्वारा निर्वाचित किया जाए या परोक्षतया विधायिका द्वारा।

नेहरू की समिति एक अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित कार्यकारी व एक एकात्मक देश की विशुद्ध संसदीय प्रणाली चाहती थी। दोनों समितियों की 7 जून, 1947 को संयुक्त बैठक हुई और केंद्र के बजाय राज्यों द्वारा नियुक्त गवर्नर के साथ स्वतंत्र राज्य सरकारें बनाने का संकल्प लिया गया। जहां तक कार्यपालिका की बात है, संयुक्त समिति ने निर्णय लिया कि यह संसदीय प्रकार की हो। परंतु इसका निर्वाचन ‘‘एक विशेष निर्वाचक मंडल के माध्यम से वयस्क मताधिकार’’ द्वारा किया जाए।

परंतु मामला तय होने से अभी बहुत दूर था। नेहरू की समिति ने संघटन संविधान को पुरानी रूपरेखा के अनुसार बनाना जारी रखा, जबकि पटेल ने प्रत्यक्ष निर्वाचित गवर्नरों के साथ प्रांतीय संविधान तैयार करना आरंभ कर दिया। कुछ दिन बाद एक और संयुक्त बैठक बुलानी पड़ी। 10 और 11 जून, 1947 को हुई इस बैठक की अध्यक्षता राजेंद्र प्रसाद ने की और इसमें नेहरू, पटेल, अंबेडकर, केएम मुंशी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, गोबिंद बल्लभ पंत, जगजीवन राम, एके अय्यर, केएम पानिक्कर और जेबी कृपलानी जैसे 36 दिग्गज शामिल हुए। दो दिन की गरमागर्म बहस के बाद संयुक्त समिति ने एक बार फिर एक प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति और गवर्नर बनाने का निश्चय किया। एक आधिकारिक प्रस्ताव में नेहरू को उनकी समिति के राष्ट्रपति अप्रत्यक्ष रूप से चुनने के निर्णय पर ‘‘पुनर्विचार’’ करने को कहा गया। परंतु उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया।

फिर भी, पटेल प्रत्यक्ष निर्वाचित गवर्नरों वाले प्रांतीय संविधान के अपने मॉडल को स्वीकृति के लिए सभा में ले गए। सदस्यों को उनकी और नेहरू की समिति के बीच असहमतियों की जानकारी नहीं थी। उन्होंने सहजता से पटेल की सिफारिशों को मंजूरी दे दी। परंतु दो साल बाद 31 मई, 1949 को एक अभूतपूर्व कदम के तहत सभा को अपना निर्णय पलटना पड़ा। संविधान के प्रारूप में ‘प्रत्यक्ष निर्वाचित’ के स्थान पर ‘नियुक्त’ गवर्नर संशोधित कर दिया गया। यह सभा के इतिहास में प्रमुख संवैधानिक सिद्धांत का एकमात्र परिवर्तन था।

अंबेडकर के विचार कि भारत में किस प्रकार की सरकार हो — उनके संसदीय प्रकार की कार्यपालिका के प्रति उग्र विरोध सहित — उनके संविधान सभा में शामिल होने से पहले ही प्रसिद्ध थे। उन्होंने वर्ष 1945 में कहा था कि ‘‘बहुमत शासन,’’ जो संसदीय सरकारों का मूल तत्त्व है, ‘‘वह सैद्धांतिक रूप से असमर्थनीय और व्यवहारिकता में असंगत है।’’ प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में काम शुरू करने से मात्र सात महीने पहले मूलभूत अधिकारों पर बनाई उपसमिति को उन्होंने एक ‘‘संयुक्त राज्य भारत’’ बनाने की योजना भी प्रस्तुत की थी। अमरीकी-प्रकार की राष्ट्रपति प्रणाली से इसमें कई समानताएं थीं। जब अंबेडकर का प्रस्ताव चर्चा के लिए लाया गया, वह बैठक में शामिल नहीं हुए। उस समय तक वह सभा में संसदीय प्रणाली अपनाने के कांग्रेस के निर्णय के मुख्य प्रचारक बन चुके थे।

जब जुलाई 1947 में नेहरू अपने संघटन संविधान प्रस्तावों को सभा में लाए, सदस्य पार्टी का निर्णय अपनाने को पूरी तरह तैयार कर लिए गए थे। वैसे भी मुस्लिम लीग के सभा से हटने के बाद, कांग्रेस पार्टी के पास लगभग 70 प्रतिशत सीटें थीं। इस तथ्य को सर्वप्रथम अंबेडकर ने कहाः ‘‘इस सदन पर कांग्रेस का कब्जा है।’’ यही नहीं, कांग्रेस सदस्यों को स्वतंत्रता से वोट देने की अनुमति भी नहीं थी।

यह एक ऐसी प्रथा थी जो संविधान बनाने वाले निकाय के विषय में दुनिया में कभी नहीं देखी गई। भारत की संविधान सभा ने पार्टी हाई कमान द्वारा जारी व्हिप की प्रणाली के अंतर्गत निर्णय लिए।

नेहरू का प्रस्ताव कि एक अप्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति और विशुद्ध संसदीय सरकार वाली उनकी संघटन संविधान रिपोर्ट को स्वीकार किया जाए आसानी से मंजूर कर लिया गया। आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस के तथाकथित विद्रोहियों — एचवी कामथ, पीएस देशमुख, आरके सिंधवा, केटी शाह, एचएन कुंजरू — में से किसी ने भी दो दोपहर चली उन बैठकों में कुछ नहीं कहा जब नेहरू के प्रस्ताव स्वीकार किए जा रहे थे। यहां तक कि वह प्रत्येक संशोधन जिसमें राष्ट्रपति प्रत्यक्ष निर्वाचित करने की बात थी, वापस ले लिए गए। एक कांग्रेसी, शिब्बन लाल सक्सेना ने यहां तक स्वीकार किया कि वह ‘‘मसले में स्वतंत्र नहीं’’ परंतु ‘‘मैं गहराई से महसूस करता हूं कि गवर्नरों के चुनाव के संबंध में जो योजना हमने प्रांतीय संविधान में स्वीकार की है, वह संघटन संविधान में भी अंगीकार की जानी चाहिए।’’

यह चौंका देने वाली बात है कि भारत की संविधान सभा ने इस प्रश्न पर कभी मतदान नहीं किया कि देश को शासन की संसदीय प्रणाली अपनानी चाहिए या कोई और। सदस्यों को केवल समितियों की सिफारिशों को मंजूरी देने का विकल्प दिया गया। उनके सामने कोई अन्य विकल्प नहीं रखा गया और न ही पुनर्विचार के लिए कोई मौका।

जब अंत में अंबेडकर ने संसदीय प्रणाली की अनुशंसा की — उनके उस प्रसिद्ध भाष्य के साथ कि यह राष्ट्रपति प्रणाली की अपेक्षा अधिक उत्तरदायी यद्यपि कम स्थायी सरकारें उपलब्ध करवाती है — संविधान अंगीकृत करने का निर्णय पहले ही ले लिया जा चुका था। वह मात्र संविधान प्रारूप को उचित ठहरा रहे थे। जिसके बारे में हर कोई जानता था कि उसे कांग्रेस पार्टी की मंजूरी प्राप्त है। हालांकि एक बार फिर यह एक कांग्रेस ही था जो चुप नहीं रह पाया। जब संविधान अंगीकृत किया जा रहा था, रामनारायण सिंह बोल पड़ेः ‘‘मैं जोर देकर कहता हूं कि यह संविधान वह नहीं जोे देश को चाहिए था… शासन की संसदीय प्रणाली इसमें से बाहर होनी चाहिए। यह पश्चिम में असफल हो चुकी है और यह इस देश को नर्क बना देगी।’’

भारत को संसदीय प्रणाली के चयन पर गंभीरतापूर्वक पुनर्विचार करना चाहिए।

 

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 25 जनवरी 2019 के अंक में प्रकाशित।

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