भारतीय धर्म निरपेक्षता असफल रही है क्योंकि यह सरकारों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने का अधिकार तो देती है, परंतु धर्मों से समान व्यवहार करने को मजबूर नहीं करती …

भानु धमीजा

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का महत्त्वाकांक्षी प्रयोग असफल हो गया है। धार्मिक निष्पक्षता के बहाने हमारी सरकारों की धर्मों में सक्रिय भागीदारी पर आधारित हमारी धर्म निरपेक्षता अत्यधिक लचीली है। इससे कुछ लोगों को फुसलाया तो गया, परंतु इसने किसी को सशक्त नहीं किया, बल्कि सबसे अन्याय ही हुआ। हमारे समाज को एकजुट करने के बजाय, इसने हमारे विविध धार्मिक समुदायों में विखंडन और अलगाव की भावना भड़काई है।

हिंदू बहुमत अब मुस्लिम अल्पमत पर लंबे समय से जारी अति उपकारों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। यह देश के सहिष्णु और बहुलवादी लोकतंत्र को खतरे में डालता है। भारत को आज धर्म निरपेक्षता की एक नई परिभाषा की सख्त आवश्यकता है। जो धार्मिक स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और धर्म व सरकार के पृथक्करण पर आधारित हो।

ये सभी आवश्यकताएं किसी भी देश की धर्म निरपेक्षता के लिए जरूरी हैं। भारतीय धर्म निरपेक्षता असफल रही है क्योंकि यह सरकारों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करने का अधिकार तो देती है, परंतु धर्मों से समान व्यवहार करने को मजबूर नहीं करती। इस संबंध में सबसे बड़ी असफलता तो गणतंत्र के शुरू में ही देखने को मिली, जब सरकार ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था को कानून में संहिताबद्ध तो कर दिया, पर मुस्लिमों को शरीया कानून का पालन करते रहने की इजाजत दे दी। सात दशकों से एक समान नागरिक संहिता की आवश्यकता भारत के संविधान में मात्र एक निर्देशक सिद्धांत बन कर रह गई है।

धर्म और सरकार के पृथक्करण (separation of religion and state) के अभाव ने भारत के धार्मिक बंधुत्व को नष्ट कर दिया है।

हमारी सरकारें हर प्रकार की धार्मिक गतिविधियों और पक्षपात में लीन रहती हैं। वे पूजा स्थलों को अपनाती और उनका संचालन करती हैं, धार्मिक विद्यालयों का वित्तपोषण करती हैं, धार्मिक संस्थाओं को टैक्स में छूट प्रदान करती हैं, उन्हें सरकारी ठेके देती हैं, उन्हें सार्वजनिक भूमि अलॉट करती हैं, यहां तक कि लोगों को धार्मिक तीर्थ यात्राओं पर ले जाती हैं। इस खुली छूट में केंद्र और राज्य सरकारें दोनों तल्लीन हैं, क्योकि संविधान ‘धार्मिक संस्थाओं’ को समवर्ती सूची में रखता है।

भारत के संविधान के कई निर्माताओं ने ऐसी सरकारी संलिप्तता का विरोध किया था। वे धर्म और सरकार के पृथक्करण के प्रावधानों को संविधान में रखवाना चाहते थे। परंतु उनकी अनदेखी की गई। एचवी कामथ ने संविधान सभा में सुझाव दिया कि एक अनुच्छेद जोड़ा जाए कि ‘‘राज्य किसी धर्म विशेष की स्थापना नहीं करेगा, उसे दान नहीं देगा, या उसका संरक्षण नहीं करेगा।’’ केटी शाह जोड़ना चाहते थे कि ‘‘भारत राज्य धर्म निरपेक्ष होने के कारण किसी भी धर्म से कोई वास्ता नहीं रखेगा।’’ परंतु बीआर अंबेडकर ने यह कहकर उनके संशोधन सिरे से नकार दिए कि उनके पास ‘‘कहने को कुछ नहीं’’ था। जब कामथ ने इस तरह सरसरी तौर पर संशोधन अस्वीकार करने का विरोध किया तो सभापति का जवाब था, ‘‘हम डा. अंबेडकर को कारण बताने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।’’

सरकारों की धार्मिक गतिविधियों पर संवैधानिक प्रतिबंधों के बिना, भारतीय धर्म निरपेक्षता सरकारों के लिए मनमानी का अधिकार क्षेत्र बन गई। वे भेदभाव, रियायतों, और लोक लुभावने नारों के जरिए धार्मिक समुदायों का फायदा उठाने लगीं।

नेहरू ने तो धर्म निरपेक्षता को समाजवाद लाने के साधन के रूप में देखा। ‘‘धर्म निरपेक्ष’’ शब्द, उन्होंने 1952 में कांग्रेस नेताओं को भेजे पत्र में लिखा, ‘‘सभी धर्मों की खुली आजादी’’ से अधिक महत्त्व रखता है… (और) सामाजिक व राजनीतिक समानता का विचार व्यक्त करता है। इस प्रकार एक जातिवादी समाज पूरी तरह धर्म निरपेक्ष नहीं है।’’ ग्रैनविल ऑस्टिन, भारतीय संविधान के विख्यात साहित्यकार ने लिखा कि ‘‘नेहरू की ‘सांप्रदायिकता’, और इसके उपचार के तौर पर ‘धर्म निरपेक्षता’, की परिभाषाएं बड़े पैमाने पर स्वीकार की गईं, जिससे उनके अर्थ जाल और अधिक घातक बन गए। उन्होंने जितनी मुश्किलें सुलझाईं उससे कहीं अधिक पैदा कीं।’’

आज, हिंदू बहुसंख्यकों मे मोदी लहर ने धर्म निरपेक्षता की नेहरूवादी अवधारणा ध्वस्त कर दी है। और यह सही भी है। नेहरू का दृष्टिकोण अव्यवहारिक था, क्योंकि यह हर सांप्रदाय की निजी पहचान को नकारता था, और यह सरकारों को दुरुपयोग करने की खुली छूट देता था। अब बहुसंख्यक अपनी भुजाएं फड़फड़ा रहे हैं और सालों के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का बदला ले रहे हैं।

यह और भी आवश्यक बना देता है कि भारत असल धर्म निरपेक्षता अपनाए, नहीं तो पेंडुलम बहुत दूर तक झूलेगा, और हिंदू कौमपरस्ती भारत के लोकतंत्र पर कब्जा कर लेगी।

परंतु इस मर्तबा हमें वास्तविक धर्म निरपेक्षता अपनानी चाहिए। इसमेंसभी तीनों आवश्यक संघटकों – स्वतंत्रता, समानता और पृथक्करण – की जरूरत है। धर्म की स्वतंत्रता पहले ही भारत के संविधान में पूर्णतया स्थापित है। समानता और पृथक्करण पर काम करने की आवश्यकता है। और इन्हें कानून के माध्यम से अधिनियमित किया जाना चाहिए।

कानून के समक्ष धार्मिक समानता के लिए, हमें एक समान नागरिक संहिता पास करनी चाहिए। भारत दो तरीकों  से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को इस बारे राजी करने में सफलता हासिल कर सकता है। पहला, सभी सरकारी लाभ (सबसिडी, सहायता, कल्याण, आदि) समान नियमों के अंतर्गत बांटे जाएं। उदाहरण के लिए, हर घर को सबसिडी का राशन एक पति/एक पत्नी के आधार पर मुहैया करवाया जाए। दूसरा, आपराधिक कानूनों के अंतर्गत प्रदान समस्त धार्मिक विशेषाधिकार निरस्त किए जाएं। इससे निश्चित होगा कि सरकारों की पुलिस शक्तियां और सहायता समान आधार पर लागू हों। ताकि अगर एक मुस्लिम महिला तलाक के लिए मदद चाहे, तो उससे वैसा ही व्यवहार हो जैसा किसी अन्य समुदाय की महिला के साथ।

जहां तक धर्म और सरकार के पृथक्करण की बात है, भारत को एक ऐसा संवैधानिक संशोधन पास करना होगा जो अमरीकी संविधान के ‘प्रथम संशोधन’ के अनुरूप हो, कि संसद ‘‘कोई ऐसा कानून नहीं बनाएगी जो धर्म की स्थापना करे, या उसकी स्वतंत्र पालना पर रोक लगाए।’’

हिंदू बहुसंख्यकों द्वारा यह कहने का प्रयास कि धर्म और सरकार का पृथक्करण आवश्यक नहीं क्योंकि उनका धर्म स्वभाव से ही धर्म निरपेक्ष है, ईमानदारी नहीं है। अगर वह सही भी हो, तो देश का कानून यदि हिंदू धर्म निरपेक्षता की पुष्टि करता है तो समुदाय के पास कुछ खोने या डरने की वजह नहीं है। अगर हिंदुत्व भारतीयता है, और समावेशी व बहुल है, जैसा वे कहते हैं, तो इसे विधान में अभिव्यक्त करने में क्या समस्या है?

धर्म निश्चित तौर पर व्यक्तिगत मसला है। इसमें राजनेताओं, विधायी सदस्यों, और अफसरों का लेना-देना नहीं होना चाहिए। हमारी लचीली धर्म निरपेक्षता की मौजूदा किस्म ने केवल हमारे नेताओं द्वारा दुरुपयोग, हमारी गलियों में हिंसा, और हमारे न्यायालयों में शरारत को बढ़ावा दिया है।

 

समय आ गया है कि भारत महान राष्ट्रों में गिना जाए और सच्ची धर्म निरपेक्षता अपनाए।

 

[लेखक चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं]

यह लेख पहले दिव्य हिमाचल 23 अगस्त 2017 के अंक में प्रकाशित।

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